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Thursday, March 14, 2019

बिहार राजनीति : जब लालू यादव ने जेपी के पैरों में गिरकर कहा, आप ही हमारे लीडर होंगे

18 अप्रैल 1974

पटना का गांधी मैदान लोगों से खचाखच भरा हुआ है। गांधी मैदान ने ऐसी भीड़ इससे पहले न कभी देखी थी और न ही कभी देखने वाला था। ये जयप्रकाश नारायण का कद था जो इतनी भीड़ को ले आये थे। उसी मंच पर एक व्यक्ति और था जो करतब जुटाकर भीड़ जुटा लेने में माहिर था। वो इस भीड़ को देखकर असमंजस में था क्योंकि उसने न इतनी भीड़ को देखा था और न ही इतने लोगों के सामने बोला था। उस शख़्स का नाम है लालू प्रसाद यादव। उस दिन लालू यादव को भीड़ से प्यार हो गया था। लेकिन ये आंदोलन ऐसे ही नहीं बना था, जयप्रकाश नारायण ऐसे ही नही आये थे। पूरी बात जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं।
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साल 1965

लालू यादव पटना के बिहार नेशनल काॅलेज में पहुंच गये। इस काॅलेज में वे छात्र जाते थे जो पढ़ने-लिखने में कमज़ोर थे। लालू यादव का भी मन पढ़ाई में नहीं लगता था। लालू यादव यहां राजनीति के मोह में नहीं गये थे, वे तो बस कुछ साल काॅलेज में बेपरवाही में गुज़ारना चाहते थे। लालू यादव उस समय काॅलेज में आये जब बी. एन. काॅलेज राजनीति का गढ़ बन चुका था। काॅलेज में एक दल संगठित हो रहा था जो गैर-कांग्रेसी हो। इनका बस एक ही मकसद था, जिस पार्टी का आज़ादी के बाद से पूरे देश पर बोलबाला रहा है, उस कांग्रेस को हराना है।
नीतीश कुमार से हाथ मिलाते हुए लालू प्रसाद यादव
बिहार में पार्टी जातिवाद में बंधी थी। सवर्ण, हरिजन और मुस्लिम कांग्रेस के वोटर थे। जनसंघ, शहर और कस्बों में व्यापारी वर्ग का था। इन सबके अलावा एक वर्ग और उभरकर आ रहा था – समाजवादी धड़ा। लालू यादव भी इस छात्र राजनीति से दूर नहीं रह पाये। लालू यादव समाजवादी धड़े में शामिल हो गये। लालू यादव को समाजवाद की विचाराधारा का ‘स’ भी नहीं पता था। वे तो बस इसलिए जुड़ गये थे क्योंकि ये उनकी जाति की पार्टी थी। लालू यादव को इस राजनीति ने सिर्फ अवसर ही नहीं दिया, पैसा भी दिया।
समाजवादी नेता श्रीकृष्ण सिंह के बेटे नरेन्द्र सिंह उस समय सक्रिय समाजवादी कार्यकर्ता थे। नरेन्द्र को हर कोई जानता था। नरेन्द्र ने लालू यादव को सोशलिस्ट पार्टी की छात्र शाखा में शामिल कर लिया। बाद में यही नरेन्द्र सिंह लालू प्रसाद की कैबिनेट में मंत्री बनने वाले थे और फिर लालू को धोखा देकर नीतीश कुमार का हाथ मिलाने वाले थे। नरेन्द्र को एक पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति की जरूरत थी और लालू यादव में उन्हें वो बात दिख रही थी। जो पिछड़ी जाति के वोट तो खींच ही सकता था और भाषण देने में भी निपुण था।
लालू प्रसाद यादव
कुछ दिनों में लालू यादव समाजवादी पार्टी छात्र नेता के रूप में फेमस हो गये थे। उसके बाद 1967 में छात्र संघ के चुनाव हुए। सबका प्रयास सफल हुआ। ऐसा पहली बार हुआ था कि सत्ता के गलियारे में कांग्रेस की हार हुई हो। विश्वविद्यालय में कांग्रेस यूनियन हार गई और समाजवादी धड़े की जीत हुई। लालू यादव को पटना विश्वविद्यालय का महासचिव बना दिया गया। 1968 और 1969 में वे इसी पद पर रहे। लालू यादव इतने फेमस थे कि 1970 में छात्रसंघ के अध्यक्ष पर उन पर ही दांव चला गया। लेकिन सबकी सोच के विपरीत इस बार लालू यादव कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गये। लालू यादव निराश हो गये और राजनीति छोड़कर नौकरी करने लगे।

साल 1973

पटना विश्वविद्यालय में एक बार फिर से गैर-कांग्रेसी दल इकट्ठा हुआ। सब कांग्रेस को हटाने की वकालत कर रहे थे। उन्हें संगठन के नेतृत्व के लिए एक जोशीला नेता चाहिए था जो पिछड़ी जाति से हो। लालू यादव को वापस बुलाया गया। लालू यादव ने राजनीति के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। इस आंदोलन में लालू यादव के साथ वे नेता शामिल थे जो उनके सबसे बड़े विरोधी होने वाले थे- सुशील मोदी और नीतीश कुमार।
नीतीश कुमार(बायीं ओर), शरद यादव(बीच में), लालू प्रसाद यादव(दायीं ओर)
जल्दी ही पटना विश्वविद्यालय राजनीति में झुलसने लगा। हर रोज प्रदर्शन और विरोध किए जाते। लालू यादव ने छात्रों के लिए मांग की। लालू यादव सबके दिलों में राज करने लगे। लालू यादव को अब छात्र संघ का अध्यक्ष बनना था लेकिन उन्होंने काॅलेज छोड़ दिया। अध्यक्ष बनने के लिए लालू यादव ने लाॅ काॅलेज में एडमिशन ले लिया। लालू चुनाव जीते और छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गये। फरवरी 1974 में लालू यादव ने सभी काॅलेजों को बंद करने की घोषणा कर दी। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष अब्दुल गफूर थे। उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
पूरे राज्य में छात्र आंदोलन ने गति पकड़ ली। विधानसभा का घेराव किया गया, जुलूस निकाले जाने लगे। जिसका नतीजा ये हुआ कि सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी और लाठीचार्ज हुआ। जिसमें दर्जनों छात्र मारे गये और सैकड़ों छात्र गिरफ्तार हो गये लेकिन लालू यादव बच निकले। वे पुलिस को देखकर भाग गये थे। बस यहीं आंदोलन में नया मोड़ आ गया।

जेपी की एंट्री

जयप्रकाश नारायण पटना वापस लौट आये थे। छात्रों ने उनसे आग्रह किया कि आप इस आंदोलन का नेतृत्व करें। जेपी नहीं चाहते थे कि ऐसे आंदोलन में शामिल हों जो हिंसा में लिप्त है। जेपी ने छात्रों के सामने शर्त रखी कि मैं नेतृत्व तभी करूंगा जब तुम लोग अहिंसा की शपथ लोगे। छात्रों ने उनकी बात मान ली। जेपी इसलिए भी खुश नहीं थे कि क्योंकि इस संगठन का नेतृत्व लालू यादव कर रहे थे।
जयप्रकाश नारायण
जेपी, लालू यादव को अविश्वसनीय व्यक्ति समझते थे। लालू यादव, जेपी के पैरों में गिर पड़े और बोले- आपको हमारा नेतृत्व करना पड़ेगा। यह एक आदमी के बारे में सोचने का समय नहीं है, देश के बारे में सोचिए। जेपी मान गये और फिर देश ने पटना के गांधी मैदान में जेपी का जादू देखा।
यह किस्सा संकर्षण ठाकुर द्वारा लिखी गई किताब 'द बिहारी ब्रदर्स' से लिया गया है।

बिहार राजनीतिः जब लालू यादव ने कहा आपको नया नेता चुनना है, चुन लीजिए

एक कमरे में दो शख्स आपस में बात कर रहे हैं। सफेद कपड़ों में बैठा व्यक्ति डरा हुआ लग रहा है। उसे डर था आने वाली सुबह का, वो डरा हुआ था कोर्ट में आये फैसले से। उसने अपने साथ वाले व्यक्ति से पूछा- क्या सीबीआई सच में उसको जेल भेज सकता है? उस व्यक्ति ने हां में जवाब दिया। कितने समय के लिए? अगला सवाल फिर आया। जवाब आया-शायद 6 महीने के लिए। उसके बाद एक उदासी भरा वाक्य कमरे में गूंजा। सही ही है, शायद मुझे जनता की थोड़ी-बहुत सहानुभूति मिल जायेगी।

24 जुलाई, 1997

पटना हाइकोर्ट में वकीलों और मीडिया की अच्छी-खासी भीड़ थी। उस दिन बिहार के मुख्यमंत्री पर फैसला होना था। सबको लग रहा था कि इस बार भी चतुर नेता फिर चूहे-बिल्ली का खेल ही खेलेंगे। लेकिन पटना हाईकोर्ट ने उस अर्जी को खारिज कर दिया। मतलब मुख्यमंत्री को अब जेल जाना था।
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लालू यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
मुख्यमंत्री जो राज्य को अपना शासन समझता था, नेता जो सबका चहेता था,जिसने चतुराई अपने गुरू चन्द्रशेखर से सीखी थी। ये बिहार के चतुर नेता लालू प्रसाद यादव के चारे घोटाले का किस्सा है। जिसमें हार के बाद भी शासन उनका ही बना रहा।
गुजराल उस समय देश के प्रधानमंत्री थे और लालू उनके चहेते माने जाते थे। जब गुजराल लालू प्रसाद को बचाने की कोशिश करने लगे तो उनको आदेश मिला कि ऐसा किया तो सरकार गिर सकती है। सरकारी बंगला, 1 अणे मार्ग जो लोगों के जमावड़े से भरा रहता था। वहां उस दिन उदासी और निराशा पसरी हुई थी। घर पर बार-बार फोन बजता और लालू उसे उठाकर गुस्से में पटक देते। राबड़ी देवी और बेटे अपने कमरे में रो रहे थे। सिर्फ बड़ी बेटी मींसा गांधी अपने पर नियंत्रण रखी थी और चुप थी।
वहीं दूसरी ओर पटना उच्च न्यायालय के बाद से कानूनी प्रक्रिया तेज होने लगी। डेढ़ साल की पूरी मेहनत के बाद लालू प्रसाद यादव के खिलाफ वारंट मिला था। उपेन्द्र नाथ बिस्वास लालू प्रसाद की गिरफ्तारी में देरी नहीं करना चाहते थे। उपेन्द्रनाथ सीबीआई निदेशक और चारा घोटाले के जांचकर्ता थे। उपेन्द्र नाथ को डर था कि लालू की गिरफ्तारी से राज्य में दंगे भड़क सकते हैं, खून खराबा हो सकता है। इसलिए पश्चिम बिहार के उस बंगले को चारों तरफ से रैपिड एक्शन फोर्स ने घेर लिया। जहां बिहार के मुख्यमंत्री और राज्यपाल रहते थे।
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लालू यादव का पूरा परिवार।
लालू यादव के बंगले से थोड़ी दूर पर भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय था। जहां बीजेपी कार्यकर्ता और समर्थक इस फैसले से जश्न मना रहे थे, मिठाई बांट रहे थे। बीजेपी नेताओं को लगने लगा कि लालू यादव का युग समाप्त हो गया है। सुशील मोदी उस फैसले को याद करते हुए बताते हैं
‘‘लालू यादव बहुत चतुर राजनीतिज्ञ है लेकिन उस शाम मुझे लगा था कि सारे रास्ते बंद हो चुके थे।”
लालू प्रसाद यादव अपना आखिरी जोर लगा रहे थे। उन्होंने दिल्ली प्रधानमंत्री गुजराल को फोन लगाया। गुजराल से लालू यादव की बात नहीं हो पाई। लेकिन एक संदेश आया, राज्यपाल ए. आर. किदवई के पास। संदेश में साफ था कि लालू यादव का वारंट आ चुका है। उनका इस्तीफा दिलवाओ या बरखास्त करो।
जांचकर्ता उपेन्द्रनाथ विस्वास के लिए वो शाम बड़ी ही अधीर थी। अगले दिन वे राज्य के सबसे बड़े नेता और मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने वाले थे। उपेन्द्रनाथ मुख्यमंत्री आवास के पास कोल इंडिया गेस्ट हाऊस में रूके हुये थे। उस दिन को याद करते हुए उपेन्द्र बताते हैं ‘‘उस समय मैं बहुत उत्साहित था और बैचेन भी। मैं जानता था लालू यादव चतुर राजनेता हैं। मैं उन सभी खामियों के बारे में सोच रहा था जिनका फायदा उठाकर लालू यादव सीबीआई के शिकंजे से बच सकते हैं।’’
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चारे घोटाले के जांचकर्ता उपेन्द्र नाथ बिस्वास।
रात 10 बजे लालू यादव अपने बंगले पर अपने साथियों के साथ बैठे थे। निराश और उदास होकर सीढ़ियों से अपने कमरे में जाने लगे। जहां उनकी पत्नी राबड़ी देवी रो रहीं थीं। लालू यादव को अब एक कठिन निर्णय लेना था। सीढ़ी चढ़ते हुये लालू प्रसाद ने निर्णय ले लिया था। अपने कमरे में जाकर अपनी पत्नी को आदेश सुना दिया।

कल तुमको सीएम पद की शपथ लेना है, तैयारी शुरू करो।

लालू यादव के संयुक्त मोर्चे ने उनका साथ देने से मना कर दिया था। अब राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना मुश्किल लग रहा था। लालू ने अपना दूसरा दांव चला। दिल्ली में बैठे कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को फोन लगाकर। केसरी उस समय फोन पर नहीं आये। लालू ने अपने विश्वसनीय राधानंद झा को एक संदेश लेकर दिल्ली भेजा। लालू प्रसाद यादव अब समर्पण करने को तैयार थे लेकिन सत्ता छोड़ने को नहीं।
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लालू यादव उस फैसले के कारण परेशान थे।

25 जुलाई 1997

उपेन्द्र नाथ बिस्वास अपनी पूरी तैयारी के साथ लालू यादव को गिरफ्तार करने जा रहे थे। तभी उनके पास एक फोन आता है। उन्हें संदेश मिलता है लालू यादव खुद आत्म समर्पण करने आ रहे हैं। बस उन्होंने इंतजाम करने के लिए थोड़ा समय मांगा है। लालू यादव विधानमंडल जाते हैं और सभी मंत्रियों के सामने इस्तीफे की घोषणा कर देते हैं।

‘‘आप लोगों को नया नेता चुनना है, चुन लीजिए।’’

इतना बोलकर लालू मीटिंग छोड़कर चले जाते हैं। थोड़ी देर बाद राबड़ी देवी पहुंचती हैं। साथ में भाई साधु यादव और अनवर अहमद भी आते हैं। नेता के चुनने की प्रक्रिया शुरू होती है। ऊर्जा मंत्री श्याम रजक एक नाम का प्रस्ताव पेश करते है और पूरे हाॅल में नारा गूंजने लगता है- ‘लालू यादव जिंदाबाद! राबड़ी देवी जिंदाबाद!
बाद में सबने लालू यादव के इस फैसले पर नैतिकता और वंशवाद की स्याही छिड़कनी चाही। लालू बेखटक जवाब देते, कैसा वंशवाद! मैंने अपनी सत्ता बचाई है। अगर राजनैतिक विरोधी को सत्ता न देना अनैतिकता है तो मैं ऐसी नैतिकता करता रहूंगा।
 ये किस्सा संकर्षण ठाकुर की किताब बिहारी बंधु के आधार पर लिखा गया है।

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