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Thursday, March 14, 2019

क्या सच में इंदिरा गांधी के फिरोज के अलावा किसी और से प्रेम संबंध थे?

इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री आवास के एक कमरे में बैठी थी। तब इन्दिरा काँग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थी। कमरे में उनके साथ एक और शख्स बैठा हुआ था। तभी उस कमरे में एक और शख्स आता है इन्दिरा के साथ उस शख्स को देखता है और गुस्से में इन्दिरा गांधी से कहता है- “मुझे तुमसे कुछ कहना था लेकिन अब बाद में कहूँगा”। इस वाकये को सुनकर लगता है कि वो गुस्सैल व्यक्ति फिरोज गांधी होंगे लेकिन वो शख्स फिरोज गांधी नहीं कोई और था। जिसने आगे चलकर बताया कि इन्दिरा गांधी और उसके बीच प्रेम संबंध थे। तब की बात में आज किस्सा इन्दिरा गांधी के प्रेम संबंध की।

फिरोज और इन्दिरा गांधी के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई थी कि लगने लगा था कि जल्दी ही दोनों के बीच तलाक हो जाएगा। इसका कारण फिरोज के कई लड़कियों के साथ प्रेम संबंध थे जिसके कारण इन्दिरा और फिरोज के रिश्ते खराब होने लगे थे। जवाहर लाल नेहरू तो पहले से ही फिरोज गांधी को पसंद नहीं करते थे। फिरोज कि मौत के दो साल पहले 1958 में पुपुल जयकर ने इंदिरा को उड़ रही अफवाह के बारे में बताया था कि फिरोज से बदला लेने के लिए वे कई पुरुषों के साथ प्रेम संबंध बना रही हैं। ये सुनकर इंदिरा गांधी ने गुस्से में कहा- ‘इससे पहले कि तुम दिल्ली की गपशप मंडली से इस बारे में जानो, मैं तुम्हें बता दूं कि मैं फिरोज को तलाक दे रही हूँ’। फिरोज गांधी ने भी ऐसा ही कुछ अपने दोस्तों से गुस्से में कहा था। फिरोज ने इंदिरा को इन्दु या मेरी पत्नी कहना बंद कर दिया था। उसकी जगह फिरोज उनको श्रीमती गांधी कहकर पुकारते।
जवाहर लाल नेहरू का पूरा जीवन बेहतर लोगों से दोस्ती बनाने में बीता। जिसका फायदा बाद में इन्दिरा गांधी को भी मिला। डीपी धर और पीएन हक्सर पंडित नेहरू के ही करीबी थे जिन्होने इन्दिरा गांधी का साथ कभी नहीं छोड़ा। ऐसे ही एक शख्स और हैं जिन्होने जवाहर लाल नेहरू को बड़े करीब से देखा, एम ओ मथाई।
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एम ओ मथाई 1946 से 1959 तक जवाहर लाल नेहरू के पर्सनल सेक्रेटरी रहे। एम ओ मथाई छोटे कद के फुर्तीले शख्स जो अपने काम को पूरी लगन से करते। उनकी यही लगन उनको नेहरू परिवार के इतने करीब बनाए हुये थी। उन्हें सभी लोग मैक कहकर पुकारते थे। मथाई नेहरू के बहुत करीब थे, वे उन लोगों में आते थे जिन पर जवाहर लाल नेहरू आँख मूंदकर विश्वास कर लेते थे। उनकी पंडित नेहरू से ये नजदीकी इन्दिरा गांधी को पसंद नहीं थी। इसका तोड़ उन्होने प्रेम निकाला। इन्दिरा गांधी कथित रूप से मथाई कि प्रेमिका थीं। एम ओ मथाई ने एक किताब लिखी ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज’, जिसमें एक चैप्टर है ‘शी’। इसमें मथाई ने इन्दिरा गांधी और अपने प्रेम के बारे में लिखा है। हालांकि ये किताब जब छपी थी तब उसमें ये चैप्टर नहीं था। जिसे बाद में मेनका गांधी ने लोगों के सामने प्रसारित किया था।
इस किताब में लिखा है कि जवाहर लाल नेहरू एडविना माउंटबैटन, पद्मजा नेहरू और मृदुल साराभाई जैसी सुंदरियों के साथ व्यस्त रहते थे। जिसकी वजह से वे अपनी सरकार सही से नहीं चला पा रहे थे। इन्हीं कारणो से हम 1962 कि जंग में चीन से हार गये। अब उस चैप्टर पर आते हैं जिसमें इंदिरा और मथाई के प्रेम के बारे में लिखा गया है। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके और इंदिरा के बीच गहरा प्रेम था और इस प्रेम कि शुरुआत इंदिरा के घर में हुई थी। मथाई बताते हैं कि उनके और इंदिरा के बीच 12 साल तक प्रेम बना रहा। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके प्रेम से इंदिरा एक बार माँ भी बनीं थीं। जिसका इंदिरा ने अबॉरशन करा लिया था।
मथाई लिखते हैं कि इंदिरा ने उनसे एक बार कहा था- मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूँ।’ जिसके जवाब में मथाई ने कहा था कि मुझे अभी इसका अनुभव नहीं है। तब इंदिरा ने उनको दो किताबें दीं जिसमें सेक्स के बारे में में जानकारी दी गई थी। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि इंदिरा उनके हाथ को सख्ती से पकड़े रहती थीं और प्यार से उनको भूपत कहती। मथाई भी इंदिरा को पुतली कहा करते थे। इसी चैप्टर में मथाई इंदिरा के बारे में लिखते हैं- उसकी क्लियोपैट्रा जैसी नाक है, पाऊलिन बोनापार्ट जैसी आँखें हैं और वीनस जैसे स्तन हैं। उसकी रूखी और घृणास्पद छवि केवल सुरक्षा का कवच था, वे बिस्तर पर बड़ी मजेदार थीं। संभोग के दौरान उसमें फ्रांसीसी औरतों और केरल की महिलाओ का मिश्रण होता, इंदिरा को लंबे-लंबे चुंबन पसंद थे। इस चैप्टर की आखिरी लाइन है- मैं भी उसे प्रेम करने लगा था।
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इस प्रेम संबंध पर इंदिरा ने कभी कोई बात नहीं की। नेहरू के जीवनी लेखक और सर्वपल्ली गोपाल ने उन दोनों के बारे में कहा था- उनको एक-दूसरे को लुभाने में बड़ा मजा आता था। इंदिरा मथाई को कुछ ज्यादा ही बढ़ावा देती थीं। कांग्रेस के नटवर शाह इस बारे में कहते हैं- मथाई ने नेहरू परिवार को बहुत नुकसान पहुंचाया। उन्होने अपने स्वार्थ के कारण इस प्रेम संबंध की अफवाह फैलाई। फिरोज के दोस्त निखिल चक्रवर्ती ने जब मथाई को पैसों के लेनदेन में गड़बड़ी करते पाया तो 1959 में उनको नेहरू परिवार से सेवा त्यागनी पड़ी। इस कहानी की शुरुआत मैंने एक किस्से से की थी। वो किस्सा था मथाई और इंदिरा के प्रेम सम्बन्धों के खत्म होने का। जब मथाई ने इंदिरा को धीरेन्द्र ब्रांहचारी के साथ देखा तो मथाई इंदिरा की जिंदगी से हमेशा के लिए चले गये। ये किस्सा है सच और झूठ के बीच का। सच क्या है वो तो या तो इंदिरा को पता था या मथाई को। मथाई ने अपने हिस्से की बातें बता दी हैं लेकिन इंदिरा की चुप्पी इस वाकये को बंद तिजोरी की तरह छोड़ गई हैं। हमारे पास तो कहानी थी सो बता दी अब सही है या गलत। ये आपके विवेक पर छोड़ते हैं।
इस आर्टिकल के अंश सागरिका घोष की किताब इन्दिरा से भी लिए गए हैं।

वो सियासी फैसला जिसके कारण इंदिरा-फिरोज के रिश्ते में कलह पड़ी

साल 1952

रायबरेली की चिलचिलाती धूप में एक तांगा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उसमें एक महिला अपने पति के लिये वोट मांग रही है। वो तांगे से उतरती है और लोगों से मुस्कुराकर वोट देनी की अपील करती है। महिला का सिर पल्लू से ढंका हुआ है। ये महिला इंदिरा गांधी थी जो अपने पति फिरोज गांधी के लिये चुनाव प्रचार कर रहीं थीं। फिरोज-इंदिरा अब सियासत के गलियारे में आ गए थे। यही सियासत दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बनाने वाली थी। यही सियासत इंदिरा गांधी से ऐसा फैसला करवाने वाली थी जो उनके और फिरोज के बीच कलह की वजह बनने वाली थी।
Related imageइंदिरा लखनऊ से नई दिल्ली आकर रहने लगी थीं। शुरूआत में इंदिरा तीन मूर्ति भवन को घर बनाने में लग गईं। वे भोजन की व्यवस्था करतीं और कार्यक्रमों का आयोजन करवाती। वे अपने पिता की कुशल प्रबंधक बन गईं। जवाहर लाल नेहरू विदेश जाते तो साथ इंदिरा भी होतीं। उनको दिल्ली की जिंदगी अच्छी लगने लगी थी। तीन मूर्ति के बारे में इंदिरा गांधी ने लिखा-
‘‘ऐसे लंबे-चौड़े कमरे, दूर तक जाते गलियारे! क्या इनको कभी रहने लायक बनाया जा सकता था? क्या इनमें घर जैसा महसूस किया जा सकता था? यदि किसी को कोई काम करना हो तो बेहतर है कि उसे बढ़िया ढंग से करे, इसलिए मैं उसी में रम गई।’’
1952 में वे राजनीति में तो आईं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। उन्होंने फूलपुर में अपने पिता के लिए प्रचार किया और रायबरेली में अपने पति के लिये। उनके इस हुनर से जवाहर लाल नेहरू काफी प्रभावित हुये। उनको कभी नहीं लगा था कि उनकी बेटी राजनीति में आने की इच्छा रखती है। लेकिन अभी वे प्रचार में व्यस्त थीं। 1952 में उन्होंने अपने पति को जिताने के लिए जबरदस्त चुनाव प्रचार किया। फिरोज चुनाव जीतकर ससंद पहुंच गये। यहां से फिरोज में एक बड़ा बदलाव आया। हमेशा पीछे बैठने वाला फिरोज संसद में पहुंचकर तेजतर्रार हो गया। वे नेहरू खेमे में वामपंथी थे वैसे ही जैसे 1940 के दौर में जवाहर लाल नेहरू थे।
1955 में फिरोज गांधी ने जीवन बीमा कारोबार में अवैध सौदों का खुलासा किया और सरकार को उसका राष्ट्रियकरण करने पर मजबूर कर दिया। वे संसद में जितने मुखर थे दिल्ली के घर में उनको उतनी ही घुटन होती थी। उनको प्रधानमंत्री का दामाद कहलवाना पसंद नहीं था। फिरोज की सफलता के कारण इंदिरा-फिरोज में प्रतिस्पर्धा होने लगी और दोनों के रिश्ते बिगड़ते गये। एक तरफ संसद में फिरोज का कद बढ़ रहा था तो इंदिरा गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। 1955 में इंदिरा गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य बन गईं। एक साल बाद उनको उसी कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया। धीरे-धीरे उनका कद बढ़ता ही जा रहा था। 1958 में वे केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की अध्यक्ष बन गईं।
Image result for indira gandhi 1960जो लोग कहते हैं कि इंदिरा के राजनीति में आने से पंडित नेहरू की भूमिका थी या वे इस फैसले से खुश थे, उनको ये बात ध्यान से सुननी चाहिये कि जवाहर लाल नेहरू वंशवाद के विरोधी थे। उन्होंने कभी इंदिरा से नहीं कहा कि तुम राजनीति में आओ। जीबी पंत के जोर देने पर इंदिरा गांधी 1959 में कांग्रेस की अध्यक्ष बन गईं। तब जवाहर लाल का कहना था-
‘सामान्यतः यह ठीक नहीं है कि मेरे प्रधानमंत्री रहते मेरी पुत्री कांग्रेस अध्यक्ष बन जाए।’
इंदिरा गांधी के राजनैतिक उफान से पति-पत्नी बहुत दूर हो गये थे। अब वे एक-दूसरे के विरोधी हो गये थे। अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी का कार्यकाल असरदार रहा। भाषाई आधार पर राज्य बंट रहे थे। हालांकि नेहरू उसके विरोध में थे। बाॅम्बे स्टेट से दो राज्य निकले गुजरात और महाराष्ट्र। लेकिन उनका एक फैसला ऐसा भी था जिसके खिलाफ नेहरू भी थे और फिरोज भी।
1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई। इस जीत ने पूरे देश को हैरत में डाल दिया। भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी। केरल में माहौल बदलने लगा था स्कूलों में गांधीजी की जगह मार्क्स की तस्वीरें दिखाई देने लगीं थीं। कांग्रेस को लगा इसको रोकना ही होगा। इंदिरा गांधी ने शिक्षा विधेयक की हित को नुकसान होने के आधार पर केरल सरकार को बरखास्त कर दिया। इंदिरा गांधी ने तब दिखा दिया था कि वे सत्ता के लिए निरंकुश हो सकती हैं। कुछ दशक बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के तौर पर एक बार फिर से सत्ता के लिए निरंकुश होने वाली थीं। लेकिन अभी नेहरू काल की बात करते हैं।
Image result for indira gandhi 1960केरल में फिर से चुनाव हुये। इस बार कम्युनिस्टों की हार हुई और इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत हुई। इंदिरा गांधी इस जीत से बहुत खुश थीं। लेकिन नेहरू और फिरोज इस फैसले से खुश नहीं थे। ये एकमात्र मौका था जब नेहरू और फिरोज की राय एक जैसी थी। सर्वपल्ली गोपाल ने बताया कि वो ऐसा फैसला था जिसने नेहरू की प्रतिष्ठा को कलंकित किया और उनकी स्थिति कमजोर हुई। केरल के फैसले के कारण इंदिरा और फिरोज के बीच गंभीर वैवाहिक कलह पैदा हो गई। फिरोज अपनी पत्नी के इस फैसले से बहुत गुस्से में आ गये। उस गुस्से का एक वाकया सुनिये।
केरल के मामले पर नेहरू-गांधी परिवार में नाश्ते के मेज पर चर्चा हुई। फिरोज ने इंदिरा से कहा- ‘यह कतई उचित नहीं है। तुम लोगों को धमका रही हो। तुम फासीवाद हो।’ इंदिरा, फिरोज की इन बातों से तमतमा गईं। वे नाश्ते को बीच में ही छोड़कर कमरे से निकल गईं और बोलीं-
‘तुम मुझे फासीवाद कह रहे हो, मैं ये कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती।’
1959 में इंदिरा ने डोरोथी नाॅर्मन को फिरोज के बारे में लिखा-
‘मुसीबतों का विशाल सागर मुझे निगलता जा रहा है। फिरोज मेरे अस्तित्व से हमेशा रूष्ट रहे हैं। चूंकि अब मैं अध्यक्ष बन गई हूं तो वे और दुश्मनी दिखा रहे हैं। सिर्फ मेरी मुश्किलें बढ़ाने के लिये साम्यवादियों की तरफ झुकते चले जा रहे हैं और कांग्रेस को मजबूत करने के लिये मेरी मेहनत पर पलीता लगा रहे हैं।’
इन सबसे परेशान होकर इंदिरा ने कांग्रेस अध्यक्ष से इस्तीफा दे दिया। वे अपने पति और बच्चों के साथ कश्मीर घूमने चली गईं। वहां उन्होंने तय कर लिया कि वे अब राजनीति छोड़कर अपने पति के साथ रहेंगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि वो ऐसा नहीं कर पाईं। वो ऐसा इसलिए नहीं कर पाईं क्योंकि वो जिसके लिये राजनीति छोड़ना चाहती थीं। वो 8 सितंबर 1960 को उनकी दुनिया से चला गया। फिरोज गांधी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। इंदिरा तब फफक-फफक कर रोईं। लेकिन इंदिरा को कई और मौतें देखनी थी और उन पर आंसू बहाने थे। ये इंदिरा और फिरोज की कहानी थी जो प्रेम के साथ शुरू हुई थी और उसका अंत टकराव से हुआ।
इन्दिरा-फिरोज के जीवन का यह वाकया सागरीका घोष की किताब इन्दिरा से लिया गया है।

Saturday, March 2, 2019

जब महात्मा गांधी ने इंदिरा और जवाहर लाल नेहरू के बीच सुलह करवाई थी

महात्मा गांधी, नेहरू परिवार के बड़े करीब थे। उनके सबसे प्रिय शिष्य नेहरू परिवार का बेटा था। वो बेटा जो विलायत और पश्चिमी सभ्यता का हिमायती था। जो आगे चलकर देश का नेतृत्व करने वाला था, जो आगे चलकर अपने बापू की मौत की खबर देने वाला था। महात्मा गांधी, नेहरू परिवार के कितने करीब थे। इस बात से पता चलता है कि आनंद भवन में महात्मा गांधी का भी एक कमरा था। वे अक्सर इलाहाबाद आते तो वहीं रूकते और बैठकों का दौर चलता। महात्मा गांधी नेहरू के लिये आदर्श थे और उनकी बेटी इंदिरा भी गांधी को देखकर ही बड़ी हो रही थी।

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इंदिरा गांधी को जवाहर लाल नेहरू ने पढ़ने के लिये विदेश भेज दिया। वहां उनकी एक लड़के से दोस्ती हुई, फिरोज गांधी। इंदिरा गांधी ने ऑक्सफोर्ड काॅलेज में एडमिशन ले लिया। इसलिये नहीं कि उनके पिता ने कहा था बल्कि वे उस शख्स के साथ रहना चाहती थी। जो उनके मां के बड़े करीब था। इंदिरा फिरोज को तब तक अपना मित्र की माना करती थीं। जब वे फिरोज के साथ समय बिताने लगीं तो दोस्ती प्यार में बदल गई। वो प्यार जो आगे जाकर पिता-पुत्री के बीच विरोध के रूप में सामने आने वाला था।

फिरोज-इंदिरा


फिरोज ने जब पहली बार इंदिरा गांधी से शादी का प्रस्ताव रखा। तब वे सिर्फ 16 साल की थीं। तब इंदिरा की मां कमला नेहरू ने मना कर दिया था। कमला का मानना था कि उनकी बेटी अभी बहुत छोटी है। 1939 में इंदिरा गांधी दोबारा लंदन गईं और फिरोज गांधी के कमरे केे पास ही अपना कमरा ले लिया। उसके 2 साल पहले ही फिरोज और इंदिरा गुपचुप तरीके से सगाई कर चुके थे। उस समय के बारे में पीएन हक्सर बाद में लिखते हैं- ‘ वे फिरोज और इंदिरा के लिये खाना बनाते थे। वे फिरोज के साथ खुश थीं। दोनों छोटे से कमरे में समय बिताते थे।’

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इंदिरा और फिरोज 1941 में डरबन होते हुये जहाज से भारत आये। इंदिरा सबसे पहले महात्मा गांधी से मिलने गईं। गांधी के आश्रम में वे सिल्क की साड़ी और लिपिस्टिक लगा कर गईं। जिसे महात्मा गांधी ने धोने को कहा और खादी की साड़ी पहनने को कहा। ये बात सुनकर इंदिरा गांधी का आश्रम से मोह भंग हो गया। उन्होंने महात्मा गांधी के आश्रम को गांधीवादी आडंबर का नाम दिया था। उन्हें लगता था कि बापू के पास देश के भविष्य का कोई खाका नहीं है।

नेहरू का विरोध


जवाहर लाल नेहरू फिरोज-इंदिरा के इस संबंध से खुश नहीं थे। इसलिये नहीं क्योंकि उनका धर्म अलग था। बल्कि उनका मानना था कि फिरोज और इंदिरा दोनों अलग सोच के हैं। नेहरू परिवार जिस सोच और पृष्ठभूमि में था, फिरोज उस दुनिया से अलग थे। जवाहर लाल नेहरू अपनी खानदानी इज्जत के लिये परेशान थे। उन्होंने तब इंदिरा गांधी को लिखा- ‘खराब स्वास्थ्य के बावजूद तुम्हारा यूरोप से वापस आना और अचानक शादी करना बेहद नासमझी की बात है।’

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पिता-पुत्री के संबंध जब खराब होने लगे। तब महात्मा गांधी को बीच में आना पड़ा। उन्हांेने जवाहर लाल नेहरू को समझाया- ‘फिरोज ने कमला नेहरू की बीमारी में उनकी सहायता की थी। वह उनके लिये पुत्र के समान था। यूरोप में इंदिरा की बीमारी के दौरान भी उसने मदद की थी। उन दोनों के बीच स्वभाविकता निकटता हो गई थी। उनको विवाह की स्वीकार्यता न देना निर्दयता होगी।’

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इसके बाद जवाहर लाल नेहरू मान गये और 26 मार्च 1942 को आनंद भवन में ही उनका विवाह हुआ। बाद में इंदिरा गांधी ने कहा- मैंने इस शादी को करके इस परिवार की सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ा था। मेरी शादी के खिलाफ हर कोई था। लेकिन मेरे लिये ये जीत स्वतंत्रता संघर्ष के बराबर थी। लेकिन जल्दी ही ये दंपत्ति उदासी में आने वाले थे और वजह इंदिरा गांधी के पापू को बनना था।

Wednesday, February 27, 2019

क्या सच में कमला नेहरू और फिरोज गांधी के बीच प्रेम-संबंध थे?

कमला नेहरू के बारे में कम लिखा गया है, कम बोला गया है। वैसे ही जैसे फिरोज गांधी के बारे में कम और इंदिरा गांधी के बारे में कम बात होती है। इतिहास के गर्त में जाकर देखें तो इन दोनों में समानतायें थीं। जिनको बाद में कुछ किस्सों ने प्रेम संबंध कहा। सबको पता है कि फिरोज गांधी सिर्फ इंदिरा गांधी के साथ प्रेम नहीं करते थे। विवाह के बाद भी उनके कई लड़कियों के साथ संबंध रहे हैं। एक बार तो जवाहर लाल नेहरू को खुद आकर समझाना पड़ा था। कई जगहों पर कहा गया है कि फिरोज गांधी और कमला नेहरू एक-दूसरे को प्रेम करते थे।

Related imageकमला और फिरोज गांधी

6 अप्रैल 1930 महात्मा गांधी ने पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ एक आंदोलन चला दिया। जगह-जगह आंदोलन होने लगे। तब इलाहाबाद मे कमला नेहरू बिस्तर और बीमारी छोड़कर इस आंदोलन का नेतृत्व करने लगीं। वे इलाहाबाद में अंग्रेजों द्वारा संचालित क्रिश्चियन स्कूल के सामने ही धरना दे रहीं थीं। चिलचिलाती धूप ने बीमार कमला को बेहोश कर दिया। तब एक हाथ जिसने कमला नेहरू की मदद की। वो आगे चलकर उनका दामाद बनने वाला था। जो उनका सबसे प्रिय होने वाला था।
वे युवक जो बचपन में सबको बुद्धू बनाने में माहिर था। वो बेहद नाजुक, खूबसूरत कमला से पलक झपकते ही प्रभावित हो गया था। जो उस समय एक प्रखर आंदोलनकारी बन चुकी थीं। वे काॅलेज छोड़कर कांग्रेस के नियमित सदस्य बन गये। वे मोतीलाल और जवाहर लाल नेहरू को अपना आदर्श मानते थे। वे रोज आनंद भवन जाने लगे। कमला नेहरू ने मानो फिरोज के लिये नई दुनिया के दरवाजे खोल दिये थे। तब कमला और फिरोज के प्रेम संबंधों की बातें होने लगीं। जिसे जवाहर लाल नेहरू ने भी खारिज कर दिया था। इन खबरों के बाद भी फिरोज गांधी आते-रहते थे।
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फिरोज-कमला के प्रेम प्रसंग पर अफवाहें होती रहीं। इलाहाबाद में इनके प्रेम संबंध पर पोस्टर लगाकर हवा देने की कोशिश भी की गई है। जवाहर लाल नेहरू ने अपने कांग्रेस साथी मीनू मसान से मजाक में कहा था, मीनू तुम कल्पना कर सकते हो कि कोई मेरी पत्नी से प्रेम कर सकता है?’ इस पर मीनू मसानी ने हिम्मत करके कहा था-‘वे खुद ही कमला से प्रेम कर सकते हैं।’
जिसे सुनकर जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें टेढ़ी नजर से घूरा। बाद में मीनू मसानी ने लिखा था ‘फिरोज का कमला के प्रति प्रेम बच्चे जैसा था।’ जब कमला नेहरू अपने जीवन के अंतिम समय पर बेडनवीलर पर थीं। तो फिरोज गांधी उनके साथ ही थे। लेकिन ये बात सरासर गलत है कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था। क्योंकि आनंद भवन तो हमेशाा सभी के लिये खुला रहता था। फिरोज को कमला नेहरू अपने बेटा जैसा समझती थीं। फिरोज की सहायता ही बाद में इंदिरा गांधी के विवाह का बड़ा कारण भी बनीं।

क्यों आखिरी समय में इंदिरा गांधी कमला नेहरू को याद करती थीं

जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर बहुत कुछ लिखा गया है, बहुत कुछ कहा गया है। चाहे वो किताबों के रूप में हों या फिर वो खत हों जो नेहरू ने इंदिरा गांधी को लिखे थे। सब यही कहते हैं कि इंदिरा गांधी अपने पिता को आदर्श मानती हैं। लेकिन इंदिरा गांधी के आखिरी वक्त में उनके बिस्तर के पास कमला नेहरू की तस्वीर लगी रहती थी। वे कमला नेहरू को याद करती थीं। उसकी वजह भी है कमला नेहरू ने इंदिरा गांधी को दबाव में रहना सिखाया था। जो बाद मे उन्हें काम भी आया जब सिंडीकेट उनको प्रधानमंत्री के पद से हटाने की कोशिश कर रहा था।
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कमला नेहरू एक शुद्ध कश्मीरी ब्राम्हण महिला। जिनकी परवरिश दिल्ली के माहौल में हुई थी। शादी के बाद वे ऐसे परिवार में चली गईं। जहां का माहौल आधुनिक पश्चिमी और भाषा अंग्रेजी थी। जहां खाना चम्मचों और छुरियों से खाया जाता था। जो परिवार देश की आजादी और राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने वाला था। इसके बावजूद उन्होंने अपना घरेलूपन नहीं छोड़ा था। इसलिये उनको अक्सर अपमानित और अनदेखा किया जाता था। जो सबसे ज्यादा जवाहर लाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी करती थीं।

मां-बेटी

वैसा ही कुछ विजयलक्ष्मी ने इंदिरा गांधी के साथ भी किया। जिसका बदला उन्होंने बाद में विजयलक्ष्मी से लिया था। इसी अपमान में घिरने के कारण कमला नेहरू बीमार पड़ गईं। इंदिरा को अपनी मां की इस स्थिति देखकर बड़ा दुख होता था। इंदिरा गांधी ने एक बार अपनी मां के बारे में जवाहर लाल नेहरू को लिखा भी था।
‘‘आपको पता भी है कि आपके पीछे से घर में क्या होता है। आपको पता है कि जब मम्मी की हालत बहुत खराब थी तो घर में तमाम लोग मौजूद थे। मगर उनमें से कोई भी उनका हाल पूछने या कुछ देर बैठने को नहीं फटका और उनको जब तकलीफ हो रही थी तो किसी ने उनकी मदद नहीं की। मम्मी को अकेले छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।’’
इसके बाद भी जवाहर लाल नेहरू ने कुछ नहीं किया। उनको वो विद्रोह बाद में फिरोज गांधी से विवाह को लेकर और राजनैतिक फैसलों को लेकर फूटा। उन्होंने कभी जवाहर लाल नेहरू को अपनी मां के लिये अपनी मां के लिये कभी माफ नहीं किया। इंदिरा गांधी ने बाद के सालों में बताया- मैंने उनके दिल पर चोट लगते देखी थी और मैं अपने साथ वैसा नहीं होने देने के लिये उद्धत थी। मैं, उन्हें बहुत शिद्धित से प्यार करती थी और मुझे जब लगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। तो मैं उनकी तरफ से खड़ी हुई और लोगों से डटकर लोहा लिया।’ इंदिरा गांधी वैसा तो नेहरू जैसी थीं लेकिन विपत्ति के समय में अपनी मां जैसी हो जाती थीं। वे अकेले ही दुश्मनों से लोहा लेने के लिये शांति से तैयार होने लगतीं।

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मां की रक्षक इंदिरा

इंदिरा गांधी अपने पिता की शार्गिद थी तो अपनी मां की रक्षक बनीं। कमला नेहरू का स्वास्थ्य 1924 में ज्यादा ही खराब हो गया। उसी समय उनका गर्भपात हुआ और दो दिन बाद उनके बेटे की मौत हो गई। जिससे वे और टूट गईं। उन्हें तब पता चला कि उनको टी.बी. है। जो उस समय मौत की बड़ी वजह मानी जाती थी। कमला नेहरू ने तब जवाहर लाल नेहरू के मित्र सैयद महमूद को लिखा ‘मैं सब पर बोझ बन गई हूं।’
कमला नेहरू के इलाज के लिये 1926 में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी स्विट्जरलैंड गये। उस यात्रा के समय इंदिरा, कमला नेहरू के साथ ही रहतीं। तब जवाहर लाल नेहरू ने अपने पिता मोतीलाल नेहरू को लिखा- ‘ मैंने देखा कि इंदु ने कमला को बार-बार चूमा। इस हरकत को रोकना चाहिए। संभव हो तो उन्हें एक-दूसरे के गले लगने से भी रोकना चाहिये, पसीने तक में बीमारी के विषाणु होते हैं।’ इसके बाद इंदिरा को कमला से दूर कर दिया गया। उनको ऐसी जगह ठहराया गया जो उनके घर से दो घंटे की दूरी पर था। हालांकि उस समय पिता-पिता के रिश्ते अच्छे हुये थे। दोनो साथ में वक्त बिताने लग गये थे। कमला नेहरू का स्वास्थ्य अच्छा होने पर सभी लोग 1927 में वापस भारत लौट आये।

Image result for indira gandhi and kamla nehruसत्याग्रही कमला

1928 में जहां साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था। वहीं कमला नेहरू ने एक बार फिर गर्भपात का दर्द झेला। इसके बाद वे और अकेलेपन और दुख की खाई में चली गईं। 1930 में नमक कानून के विरोध में दांडी यात्रा का ऐलान किया। देश भर में जगह-जगह आंदोलन हुये। तब इलाहाबाद में अपना बिस्तर छोड़कर इस आंदोलन का नेतृत्व करने लगीं। उन्होंने इलाहाबाद में अंग्रेज संचालित क्रिश्चियन स्कूल के सामने धरना दिया। तब कमला नेहरू उस धूप के कारण बेहोश हो गई। तब उनकी सहायता उस लड़के ने की जो आगे चलकर नेहरू परिवार का दामाद बनने वाला था। जिसके लिये इंदिरा गांधी अपने पिता से बगावत करने वाली थीं।
1931 में जब नेहरू जेल में थे। तब कमला नेहरू को भी गिरफ्तार कर लिया गया। ये इंदिरा की जीत थी। इससे कमला नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन की एक पहचान बन गईं। इसके बाद वे तेजतर्रार आंदोलनकारी बन गईं। अब हर कोई उनकी इज्जत करने लगा। इस पर इंदिरा गांधी खुश होते हुये लिखती हैं- ‘लोग मेरे दादाजी और पिताजी को तो जानते हैं। मगर और भी अधिक महत्वपूर्ण भाग मेरी मां ने अदा किया था। मेरे पिता ने जब गांधीजी का साथ देने का मन बनाया तो उन्हें समूचे परिवार का विरोध झेलना पड़ा था। सिर्फ मेरी मां के साहसिक और लगातार समर्थन के बूते ही वे इतना बड़ा फैसला कर पाये। जिसने भारत के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी।’ कमला नेहरू ने जेल से अपनी बेटी को खत लिखा- ‘मैं बैरक के बाहर जब भी टहलने के लिये निकलती हूं तो मुझे तुम्हारा ख्याल आता है। मैं जब रिहा हो जाउंगी तो हम टहलने के लिये साथ-साथ बाहर जायेंगे। हालांकि वो मौका 6 महीने बाद आयेगा लेकिन 6 महीने बीतने का मुझे या तुम्हें पता भी नहीं चलेगा’
Related image28 फरवरी 1931 को कमला नेहरू का निधन हो गया। उस समय इंदिरा गांधी उस समय शांति निकेतन में थीं। इंदिरा गांधी का मानना था कि उनकी मां ही थीं जिनकी बराबरी उनके पिता कभी नहीं कर पाये। इंदिरा कहती थी कि मैं असाधारण पिता और विलक्षण मां की बेटी हूं।

शकुंतला देवी किसी गणितज्ञ से ज्यादा मां-बेटी के रिश्ते की कहानी लगती है

तुम्हें क्यों लगता है औरत को किसी आदमी की जरूरत है। एक लड़की जो खेलते-खेलते गणित के मुश्किल सवाल को झटपट हल कर देती है। जो कभी स्कूल नहीं गई ...