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Thursday, March 14, 2019

क्या सच में इंदिरा गांधी के फिरोज के अलावा किसी और से प्रेम संबंध थे?

इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री आवास के एक कमरे में बैठी थी। तब इन्दिरा काँग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थी। कमरे में उनके साथ एक और शख्स बैठा हुआ था। तभी उस कमरे में एक और शख्स आता है इन्दिरा के साथ उस शख्स को देखता है और गुस्से में इन्दिरा गांधी से कहता है- “मुझे तुमसे कुछ कहना था लेकिन अब बाद में कहूँगा”। इस वाकये को सुनकर लगता है कि वो गुस्सैल व्यक्ति फिरोज गांधी होंगे लेकिन वो शख्स फिरोज गांधी नहीं कोई और था। जिसने आगे चलकर बताया कि इन्दिरा गांधी और उसके बीच प्रेम संबंध थे। तब की बात में आज किस्सा इन्दिरा गांधी के प्रेम संबंध की।

फिरोज और इन्दिरा गांधी के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई थी कि लगने लगा था कि जल्दी ही दोनों के बीच तलाक हो जाएगा। इसका कारण फिरोज के कई लड़कियों के साथ प्रेम संबंध थे जिसके कारण इन्दिरा और फिरोज के रिश्ते खराब होने लगे थे। जवाहर लाल नेहरू तो पहले से ही फिरोज गांधी को पसंद नहीं करते थे। फिरोज कि मौत के दो साल पहले 1958 में पुपुल जयकर ने इंदिरा को उड़ रही अफवाह के बारे में बताया था कि फिरोज से बदला लेने के लिए वे कई पुरुषों के साथ प्रेम संबंध बना रही हैं। ये सुनकर इंदिरा गांधी ने गुस्से में कहा- ‘इससे पहले कि तुम दिल्ली की गपशप मंडली से इस बारे में जानो, मैं तुम्हें बता दूं कि मैं फिरोज को तलाक दे रही हूँ’। फिरोज गांधी ने भी ऐसा ही कुछ अपने दोस्तों से गुस्से में कहा था। फिरोज ने इंदिरा को इन्दु या मेरी पत्नी कहना बंद कर दिया था। उसकी जगह फिरोज उनको श्रीमती गांधी कहकर पुकारते।
जवाहर लाल नेहरू का पूरा जीवन बेहतर लोगों से दोस्ती बनाने में बीता। जिसका फायदा बाद में इन्दिरा गांधी को भी मिला। डीपी धर और पीएन हक्सर पंडित नेहरू के ही करीबी थे जिन्होने इन्दिरा गांधी का साथ कभी नहीं छोड़ा। ऐसे ही एक शख्स और हैं जिन्होने जवाहर लाल नेहरू को बड़े करीब से देखा, एम ओ मथाई।
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एम ओ मथाई 1946 से 1959 तक जवाहर लाल नेहरू के पर्सनल सेक्रेटरी रहे। एम ओ मथाई छोटे कद के फुर्तीले शख्स जो अपने काम को पूरी लगन से करते। उनकी यही लगन उनको नेहरू परिवार के इतने करीब बनाए हुये थी। उन्हें सभी लोग मैक कहकर पुकारते थे। मथाई नेहरू के बहुत करीब थे, वे उन लोगों में आते थे जिन पर जवाहर लाल नेहरू आँख मूंदकर विश्वास कर लेते थे। उनकी पंडित नेहरू से ये नजदीकी इन्दिरा गांधी को पसंद नहीं थी। इसका तोड़ उन्होने प्रेम निकाला। इन्दिरा गांधी कथित रूप से मथाई कि प्रेमिका थीं। एम ओ मथाई ने एक किताब लिखी ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज’, जिसमें एक चैप्टर है ‘शी’। इसमें मथाई ने इन्दिरा गांधी और अपने प्रेम के बारे में लिखा है। हालांकि ये किताब जब छपी थी तब उसमें ये चैप्टर नहीं था। जिसे बाद में मेनका गांधी ने लोगों के सामने प्रसारित किया था।
इस किताब में लिखा है कि जवाहर लाल नेहरू एडविना माउंटबैटन, पद्मजा नेहरू और मृदुल साराभाई जैसी सुंदरियों के साथ व्यस्त रहते थे। जिसकी वजह से वे अपनी सरकार सही से नहीं चला पा रहे थे। इन्हीं कारणो से हम 1962 कि जंग में चीन से हार गये। अब उस चैप्टर पर आते हैं जिसमें इंदिरा और मथाई के प्रेम के बारे में लिखा गया है। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके और इंदिरा के बीच गहरा प्रेम था और इस प्रेम कि शुरुआत इंदिरा के घर में हुई थी। मथाई बताते हैं कि उनके और इंदिरा के बीच 12 साल तक प्रेम बना रहा। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके प्रेम से इंदिरा एक बार माँ भी बनीं थीं। जिसका इंदिरा ने अबॉरशन करा लिया था।
मथाई लिखते हैं कि इंदिरा ने उनसे एक बार कहा था- मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूँ।’ जिसके जवाब में मथाई ने कहा था कि मुझे अभी इसका अनुभव नहीं है। तब इंदिरा ने उनको दो किताबें दीं जिसमें सेक्स के बारे में में जानकारी दी गई थी। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि इंदिरा उनके हाथ को सख्ती से पकड़े रहती थीं और प्यार से उनको भूपत कहती। मथाई भी इंदिरा को पुतली कहा करते थे। इसी चैप्टर में मथाई इंदिरा के बारे में लिखते हैं- उसकी क्लियोपैट्रा जैसी नाक है, पाऊलिन बोनापार्ट जैसी आँखें हैं और वीनस जैसे स्तन हैं। उसकी रूखी और घृणास्पद छवि केवल सुरक्षा का कवच था, वे बिस्तर पर बड़ी मजेदार थीं। संभोग के दौरान उसमें फ्रांसीसी औरतों और केरल की महिलाओ का मिश्रण होता, इंदिरा को लंबे-लंबे चुंबन पसंद थे। इस चैप्टर की आखिरी लाइन है- मैं भी उसे प्रेम करने लगा था।
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इस प्रेम संबंध पर इंदिरा ने कभी कोई बात नहीं की। नेहरू के जीवनी लेखक और सर्वपल्ली गोपाल ने उन दोनों के बारे में कहा था- उनको एक-दूसरे को लुभाने में बड़ा मजा आता था। इंदिरा मथाई को कुछ ज्यादा ही बढ़ावा देती थीं। कांग्रेस के नटवर शाह इस बारे में कहते हैं- मथाई ने नेहरू परिवार को बहुत नुकसान पहुंचाया। उन्होने अपने स्वार्थ के कारण इस प्रेम संबंध की अफवाह फैलाई। फिरोज के दोस्त निखिल चक्रवर्ती ने जब मथाई को पैसों के लेनदेन में गड़बड़ी करते पाया तो 1959 में उनको नेहरू परिवार से सेवा त्यागनी पड़ी। इस कहानी की शुरुआत मैंने एक किस्से से की थी। वो किस्सा था मथाई और इंदिरा के प्रेम सम्बन्धों के खत्म होने का। जब मथाई ने इंदिरा को धीरेन्द्र ब्रांहचारी के साथ देखा तो मथाई इंदिरा की जिंदगी से हमेशा के लिए चले गये। ये किस्सा है सच और झूठ के बीच का। सच क्या है वो तो या तो इंदिरा को पता था या मथाई को। मथाई ने अपने हिस्से की बातें बता दी हैं लेकिन इंदिरा की चुप्पी इस वाकये को बंद तिजोरी की तरह छोड़ गई हैं। हमारे पास तो कहानी थी सो बता दी अब सही है या गलत। ये आपके विवेक पर छोड़ते हैं।
इस आर्टिकल के अंश सागरिका घोष की किताब इन्दिरा से भी लिए गए हैं।

वो सियासी फैसला जिसके कारण इंदिरा-फिरोज के रिश्ते में कलह पड़ी

साल 1952

रायबरेली की चिलचिलाती धूप में एक तांगा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उसमें एक महिला अपने पति के लिये वोट मांग रही है। वो तांगे से उतरती है और लोगों से मुस्कुराकर वोट देनी की अपील करती है। महिला का सिर पल्लू से ढंका हुआ है। ये महिला इंदिरा गांधी थी जो अपने पति फिरोज गांधी के लिये चुनाव प्रचार कर रहीं थीं। फिरोज-इंदिरा अब सियासत के गलियारे में आ गए थे। यही सियासत दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बनाने वाली थी। यही सियासत इंदिरा गांधी से ऐसा फैसला करवाने वाली थी जो उनके और फिरोज के बीच कलह की वजह बनने वाली थी।
Related imageइंदिरा लखनऊ से नई दिल्ली आकर रहने लगी थीं। शुरूआत में इंदिरा तीन मूर्ति भवन को घर बनाने में लग गईं। वे भोजन की व्यवस्था करतीं और कार्यक्रमों का आयोजन करवाती। वे अपने पिता की कुशल प्रबंधक बन गईं। जवाहर लाल नेहरू विदेश जाते तो साथ इंदिरा भी होतीं। उनको दिल्ली की जिंदगी अच्छी लगने लगी थी। तीन मूर्ति के बारे में इंदिरा गांधी ने लिखा-
‘‘ऐसे लंबे-चौड़े कमरे, दूर तक जाते गलियारे! क्या इनको कभी रहने लायक बनाया जा सकता था? क्या इनमें घर जैसा महसूस किया जा सकता था? यदि किसी को कोई काम करना हो तो बेहतर है कि उसे बढ़िया ढंग से करे, इसलिए मैं उसी में रम गई।’’
1952 में वे राजनीति में तो आईं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। उन्होंने फूलपुर में अपने पिता के लिए प्रचार किया और रायबरेली में अपने पति के लिये। उनके इस हुनर से जवाहर लाल नेहरू काफी प्रभावित हुये। उनको कभी नहीं लगा था कि उनकी बेटी राजनीति में आने की इच्छा रखती है। लेकिन अभी वे प्रचार में व्यस्त थीं। 1952 में उन्होंने अपने पति को जिताने के लिए जबरदस्त चुनाव प्रचार किया। फिरोज चुनाव जीतकर ससंद पहुंच गये। यहां से फिरोज में एक बड़ा बदलाव आया। हमेशा पीछे बैठने वाला फिरोज संसद में पहुंचकर तेजतर्रार हो गया। वे नेहरू खेमे में वामपंथी थे वैसे ही जैसे 1940 के दौर में जवाहर लाल नेहरू थे।
1955 में फिरोज गांधी ने जीवन बीमा कारोबार में अवैध सौदों का खुलासा किया और सरकार को उसका राष्ट्रियकरण करने पर मजबूर कर दिया। वे संसद में जितने मुखर थे दिल्ली के घर में उनको उतनी ही घुटन होती थी। उनको प्रधानमंत्री का दामाद कहलवाना पसंद नहीं था। फिरोज की सफलता के कारण इंदिरा-फिरोज में प्रतिस्पर्धा होने लगी और दोनों के रिश्ते बिगड़ते गये। एक तरफ संसद में फिरोज का कद बढ़ रहा था तो इंदिरा गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। 1955 में इंदिरा गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य बन गईं। एक साल बाद उनको उसी कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया। धीरे-धीरे उनका कद बढ़ता ही जा रहा था। 1958 में वे केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की अध्यक्ष बन गईं।
Image result for indira gandhi 1960जो लोग कहते हैं कि इंदिरा के राजनीति में आने से पंडित नेहरू की भूमिका थी या वे इस फैसले से खुश थे, उनको ये बात ध्यान से सुननी चाहिये कि जवाहर लाल नेहरू वंशवाद के विरोधी थे। उन्होंने कभी इंदिरा से नहीं कहा कि तुम राजनीति में आओ। जीबी पंत के जोर देने पर इंदिरा गांधी 1959 में कांग्रेस की अध्यक्ष बन गईं। तब जवाहर लाल का कहना था-
‘सामान्यतः यह ठीक नहीं है कि मेरे प्रधानमंत्री रहते मेरी पुत्री कांग्रेस अध्यक्ष बन जाए।’
इंदिरा गांधी के राजनैतिक उफान से पति-पत्नी बहुत दूर हो गये थे। अब वे एक-दूसरे के विरोधी हो गये थे। अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी का कार्यकाल असरदार रहा। भाषाई आधार पर राज्य बंट रहे थे। हालांकि नेहरू उसके विरोध में थे। बाॅम्बे स्टेट से दो राज्य निकले गुजरात और महाराष्ट्र। लेकिन उनका एक फैसला ऐसा भी था जिसके खिलाफ नेहरू भी थे और फिरोज भी।
1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई। इस जीत ने पूरे देश को हैरत में डाल दिया। भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी। केरल में माहौल बदलने लगा था स्कूलों में गांधीजी की जगह मार्क्स की तस्वीरें दिखाई देने लगीं थीं। कांग्रेस को लगा इसको रोकना ही होगा। इंदिरा गांधी ने शिक्षा विधेयक की हित को नुकसान होने के आधार पर केरल सरकार को बरखास्त कर दिया। इंदिरा गांधी ने तब दिखा दिया था कि वे सत्ता के लिए निरंकुश हो सकती हैं। कुछ दशक बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के तौर पर एक बार फिर से सत्ता के लिए निरंकुश होने वाली थीं। लेकिन अभी नेहरू काल की बात करते हैं।
Image result for indira gandhi 1960केरल में फिर से चुनाव हुये। इस बार कम्युनिस्टों की हार हुई और इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत हुई। इंदिरा गांधी इस जीत से बहुत खुश थीं। लेकिन नेहरू और फिरोज इस फैसले से खुश नहीं थे। ये एकमात्र मौका था जब नेहरू और फिरोज की राय एक जैसी थी। सर्वपल्ली गोपाल ने बताया कि वो ऐसा फैसला था जिसने नेहरू की प्रतिष्ठा को कलंकित किया और उनकी स्थिति कमजोर हुई। केरल के फैसले के कारण इंदिरा और फिरोज के बीच गंभीर वैवाहिक कलह पैदा हो गई। फिरोज अपनी पत्नी के इस फैसले से बहुत गुस्से में आ गये। उस गुस्से का एक वाकया सुनिये।
केरल के मामले पर नेहरू-गांधी परिवार में नाश्ते के मेज पर चर्चा हुई। फिरोज ने इंदिरा से कहा- ‘यह कतई उचित नहीं है। तुम लोगों को धमका रही हो। तुम फासीवाद हो।’ इंदिरा, फिरोज की इन बातों से तमतमा गईं। वे नाश्ते को बीच में ही छोड़कर कमरे से निकल गईं और बोलीं-
‘तुम मुझे फासीवाद कह रहे हो, मैं ये कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती।’
1959 में इंदिरा ने डोरोथी नाॅर्मन को फिरोज के बारे में लिखा-
‘मुसीबतों का विशाल सागर मुझे निगलता जा रहा है। फिरोज मेरे अस्तित्व से हमेशा रूष्ट रहे हैं। चूंकि अब मैं अध्यक्ष बन गई हूं तो वे और दुश्मनी दिखा रहे हैं। सिर्फ मेरी मुश्किलें बढ़ाने के लिये साम्यवादियों की तरफ झुकते चले जा रहे हैं और कांग्रेस को मजबूत करने के लिये मेरी मेहनत पर पलीता लगा रहे हैं।’
इन सबसे परेशान होकर इंदिरा ने कांग्रेस अध्यक्ष से इस्तीफा दे दिया। वे अपने पति और बच्चों के साथ कश्मीर घूमने चली गईं। वहां उन्होंने तय कर लिया कि वे अब राजनीति छोड़कर अपने पति के साथ रहेंगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि वो ऐसा नहीं कर पाईं। वो ऐसा इसलिए नहीं कर पाईं क्योंकि वो जिसके लिये राजनीति छोड़ना चाहती थीं। वो 8 सितंबर 1960 को उनकी दुनिया से चला गया। फिरोज गांधी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। इंदिरा तब फफक-फफक कर रोईं। लेकिन इंदिरा को कई और मौतें देखनी थी और उन पर आंसू बहाने थे। ये इंदिरा और फिरोज की कहानी थी जो प्रेम के साथ शुरू हुई थी और उसका अंत टकराव से हुआ।
इन्दिरा-फिरोज के जीवन का यह वाकया सागरीका घोष की किताब इन्दिरा से लिया गया है।

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