Showing posts with label climate change. Show all posts
Showing posts with label climate change. Show all posts

Sunday, October 6, 2019

आरे काॅलोनीः रात के अंधेेरे में अंधेर नगरी में एक हत्याकांड

हम सभी का मानना है कि प्रकृति के बीच रहने के कई फायदे होते हैं। तन और मन हमेशा तरोताजा रहते हैं, ऐसा मैं नहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं। लेकिन हमारा देश न जाने किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर्यावरण को बचाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुंबई की आरे काॅलोनी में पेड़ काटे जा रहे हैं। कहा जाता है कि एक पेड़, 100 बेटों के बराबर होता है। मतलब बेटे जितना नहीं करते, उससे ज्यादा फायदा इन पेड़ों से होता है। कहा जाता है कि एक पेड़ एक साल में करीब 117 किलोग्राम ऑक्सीजन देता है और करीब 20 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। 4 डिग्री तापमान को नियंत्रण करता है और कई खतरनाक तत्वों को सोखता है। इसके अलावा हमें इन पेड़ों से चारा मिलता है, फल मिलते है और लकड़िया भी मिलती हैं। से सब बताते हैं कि पेड़ हमारे लिए कितने फायदेमंद हैं। ये अच्छे से समझ लेना चाहिए कि अगर हम पेड़ों को काट रहे हैं तो खुद के जीवन को कम कर रहे हैं।


विकास बनाम पर्यावरण


बिना पेड़ों के जीवन संभव नहीं है कि लेकिन अपने ऑफिस मेंं मजे से बैठे सरकार के मंत्रियों को ये बात कभी समझ नहीं आएगी। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर पेड़ों के संरक्षण के लिए नहीं, पेड़ों के कटने के समर्थन में बयान दे रहे हैं। पेड़ों को काटने की वजह है, मुंबई मेट्रो। हर बार यही शहरीकरण और आधुनिकता के लिए हम पेड़ों को काटते जाते हैं। लेकिन मेरे ख्याल से इसे पेड़ काटना नहीं, पेड़ो की हत्या कहा जाना सही होगा। वर्ना रात के पहर में चोरों की तरह क्यों पेड़ काटे गए?  हमेशा जागने वाली मुंबई शायद इस रात सो गई थी। सोचिए क्या हाल होगा? जब सरकार आपके घर को बुल्डोजर से तोड़ रही हो और आप कुछ न कर पा रहे हों, सिवाय बिलखने के। वैसा ही हाल मुंबई के आरे काॅलोनी का था।

अब सबको समझ जाना चाहिए ये नया भारत कहने वाले, पेड़ों के नहीं हैं, पर्यावरण के नहीं है। इन्हें तो बस विकास चाहिए। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर कहते हैं, जब दिल्ली में मेट्रे स्टेशन बनना था। तब 20-25 पेड़ काटे जाने थे, तब भी विरोध हुआ था। दिल्ली में 271 मेटो स्टेशन बनाए गए हैं और पेड़ों की संख्या भी बढ़ी है।’ मंत्री साहब भूल जाते हैं कि दिल्ली और मुंबई में कितना अंतर है? दिल्ली में पहले से ही बहुत पेड़ हैं और मुंबई की आरे काॅलोनी इकलौता बचा जंगल है। आप कह रहे हैं कि पेड़ काटकर हम पौधे लगायेंगे। पौधे को बड़ा पेड़ बनने में 5 साल तो लग ही जाते हैं। तब तक क्या मुंबई बिना पेड़ों की रहेगी?

सोशल मीडिया पर बोलती प्रबुद्धता


मुंबई में देश के सबसे प्रबुद्ध लोग रहते हैं लेकिन इनकी बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ सोशल मीडिया और सिनेमा पर ही 
दिखाई देती है। वो प्रबुद्ध लोग जब रात को आराम से नींद ले रहे थे, तब आरे काॅलोनी में आरी चलाई जा रही थी। तब कुछ लोग थे जो इस कटाई का विरोध कर रहे थे। शायद इन लोगों को पता नहीं था कि ये सब विकास के लिए हो रहा था। तभी तो 38 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और इलाके में धारा 144 लगा दी गई है। मैंने अब तक कश्मीर में हिंसा पर, 370 का एक भाग हटाने पर, दिल्ली में किसानों की रैली पर, जाट आरक्षण पर धारा 144 लगते देखी थी। मैं पहली बार देख रहा हूं कि पेड़ों को काटने के लिए धारा 144 लग रही है।


मुंबई के गोरेगांव में बसी आरे काॅलोनी इस महानगर की सबसे हरी-भरी जगह है। 16 वर्ग किमी. में स्थित यह एक हरित पट्टी है। जो 1949 में दूध देने वाले पशुओं को रखने के लिए बनाई गई थी। इसके एक छोर पर संजय गांधी नेशनल पार्क है तो दूसरी ओर पवई लेक, तुलसी लेक और विहार लेक जैसी तीन बड़ी झीलें हैं। अगर इन पेड़ों को काटा गया तो जल्दी ही ये तीन बड़ी झीलें भी खत्म हो जाएंगी। जल संकट का एक बड़ी वजह पेड़ों का खत्म होना भी है। पेड़ों को काटकर पौधारोपण करना कोई समाधान नहीं है। अगर आप ऐसा कुछ करना ही चाहते हैं तो पौधों को लगाकर पेड़ बन जाने दीजिए, उसके बाद उन पुराने पेड़ों को काटिए जिनको आप काटना चाहते हैं। तब आपकी बात न्यायसंगत लगेगी।

हाई कोर्ट बड़ा या सुप्रीम कोर्ट?


ये सब हुआ मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले से। जिसमें उन्होंने कहा कि मुंबई महानगरपालिका के वृक्ष प्राधिकरण का मेट्रो-3 के लिए वृक्षों की कटाई का फैसला पूरी तरह से सही है। हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए दायर जोरू बाथेना की याचिका खारिज की दी। मुंबई की मेट्रो के काम के लिए आरे काॅलोनी के 2,464 पेड़ काटे जाने हैं। फैसला आते ही शाम को पेड़ों को काटना शुरू कर दिया गया। मामला फिर भी अभी तक सुलझा नहीं था। मुंबई हाईकोर्ट ने तो फैसला सुना दिया लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है। यही मामला एनजीटी में भी चल रहा है। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से कब से बड़ी हो गई? पुलिस को आम लोगों की बजाय उन पेड़ काटने वालों को गिरफतार करना चाहिए।

मुझे नहीं पता कि इस मेट्रो से किन लोगों को फायदा होने वाला है। देश के सबसे पूंजीपतियों को या देश की जनता को जैसा सरकार हर योजना पर कहती है। लेकिन ऐसे विकास क्या ही फायदा जो हमारे आने वाले भविष्य को खत्म कर रहा है? हमारी मौलिकता को खत्म कर रहा है। नेता भाषणों में तो दुनिया बदलने की बात कहते हैं लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है तो सबसे पीछे अंगड़ाई ले रहे होते हैं। फाॅरेस्ट रिर्सोसेज आंकलन के अनुसार, 1990 और 2015 के बीच दुनिया भर में जंगल 31.6 फीसदी से घटकर 30 फीसदी पर जा पहुंचे हैं। हम दुनिया को बताते हैं कि हम हरे-भरे देश हैं लेकिन अंदर ही अंदर हम इस हरियाली को खत्म करने पर तुले हुए हैं।


पेड़ो को खत्म करके ऊंची-ऊंची इमारत बना सकते हैं, लंबी-लंबी मेट्रो बनाकर खुश हो सकते हैं। लेकिन इस विकास में एक कमी तो है, लोगों की भलाई। पेड़ सिर्फ हरियाली के लिए नहीं होते हैं, उनसे बारिश होती है, ऑक्सजीन आती है और काॅर्बनडाईआक्साइड जाती है। दुनिया भर की सरकारें विकास के नाम पर आरे काॅलोनी की तरह पेड़ों को काट रही हैं। हर साल हम 1 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर वनों को खो देते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर वापस लौटना बहुत मुश्किल हो जाएगा। हमारे इसी रवैये की वजह से पेड़ हमसे दूर हो रहे हैं। अभी भी समय है हमें पर्यावरण के लिए गंभीर हो जाना चाहिए। अन्यथा भविष्य तो दूर की बात है, वर्तमान भी संकट में आ जाएगा।

Tuesday, September 24, 2019

ग्रेटा थनबर्ग की इन बातों पर ध्यान दें!

यूएन का सम्मेलन चल रहा है। विश्व भर के बड़े-बड़े नेता यहां बैठे हैं। उन्हीं के बीच बैठी है एक 16 साल की लड़की। 16 साल की ये लड़की सबको सुनती है और फिर बोलती है। वो लगभग चीखते हुए बोलती है, ‘ये सब गलत है। मुझे यहां नहीं होना चाहिए। मुझे तो इस समुन्दर के पार अपने स्कूल में होना चाहिए। आप सभी मेरे पास एक उम्मीद लेकर आए हैं। आपकी हिम्मत कैसे हुई? आपने अपने खोखले शब्दों के लिए मुझसे मेरे सपने और बचपन को छीन लिया है। लोग परेशान हो रहे हैं, मर रहे हैं। पूरा इको-सिस्टम खराब हो रहा है और आप विकास के नाम की जादुई कहानी सुनाने में लगे हैं। आपकी हिम्मत कैसे हुई? ये बातें बोल रही थी एक लड़की जिसके साथ आज लाखों लोग खड़े हैं। जिसने पूरी दुनिया को बताया कि अब समय आ गया है। जब हम खड़े हों और विरोध करें। इस 16 साल की लड़की का नाम है ग्रेटा थनबर्ग।


ग्रेटा उन सभी लोगों से ज्यादा समझदार है जो ऑफिस में बैठकर प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग पर अफसोस जताते हैं। ग्रेटा थनबर्ग को आज हर कोई जानता है, जिसे बोलने के लिए यूएन बुला रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्रेटा घर से निकली और हर कोई सुनने लगा। आज जब ग्रेटा कुछ बोलने के लिए खड़ी होती है तो लाखों लोग सुनते हैं। लेकिन एक साल पहले ग्रेटा अकेली थी। वो स्वीडन की गलियों में, संसद के बाहर अकेले एक बोर्ड के साथ खड़ी रही। वो हर शुक्रवार को यहां आतीं और यही काम करतीं। तब ग्रेटा का साथ न ही उनके माता-पिता दे रहे थे और न ही उनके दोस्त। उसी 15 साल की लड़की की वजह से ब्रिटेन में लाखों लोग सड़क पर उतर आए। जिस वजह से ब्रिटेन की संसद को क्लाइमेट इमरजेंसी लगानी पड़ी। ब्रिटेन ऐसा करने वाला पहला देश बन गया। तब पहली बार दुनिया ने ग्रेटा के बारे में सुना। ग्रेटा कार्बन के उत्सर्जन को कम करने की बात कहती हैं। वो सिर्फ कहती ही नहीं है, करती भी हैं। ग्रेटा हवाई जहाज से सफर नहीं करती हैं। वो सड़क और पानी के रास्ते हर जगह जाती हैं। वो अपनी उम्र के लोगों से अपील करती हैं कि अब हमें ही इस समस्या से लड़ना होगा।

वो इस सम्मेलन में करीब-करीब रोते हुए बोलती हैं, 'आप कहते हैं कि आप सुन रहे हैं। लेकिन आपको कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम कितने दुखी हैं और गुस्से में हैं। क्योंकि अगर आप इस स्थिति को समझ रहे होते तो उस पर काम कर रहे होते।' पेरिस जलवायु सम्मेलन में कहा गया था कि कार्बन उत्सर्जन को आधा कम कर देंगे। ऐसा करने पर हमारी दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री हो जाएगा, जो 1991 में था। लेकिन हम इसे कम कर ही नहीं पा रहे हैं। सब भाषण दे रहे हैं लेकिन उसको कम कैसे किया जाए इस पर कोई प्लान नहीं बन रहे है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि अगर अब तापमान कम नहीं किया गया तो 2100 में दुनिया भर के बड़े शहर जल मग्न हो जाएंगे। जिसमें सिडनी, मैक्सिको और लॉस एंजिल्स जैसे शहर शामिल हैं। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता के आधे से ज्यादा भाग डूब चुका है। इसी वजह से इंडोनेशिया ने अपनी राजधानी बदलने की घोषणा कर दी है। 

ग्रेटा थनबर्ग

ग्रेटा भावुक होते हुए कहती हैं, आप माने या न माने युवाओं में बदलाव आ रहा है, लोग जाग रहे हैं। वो सभी समझते हैं कि आप लोग कुछ नहीं कर रहे हैं। अगर अब आपने कुछ नहीं किया तो हम लोग आपको कभी माफ नहीं करेंगे। ग्रेटा ने एक साल पहले जो काम खुद किया था उसको करने का हर किसी से कहती हैं। लोगों को अब तख्तियां लेकर सड़कों पर निकल जाना चाहिए। ग्रेटा ने इसके लिए एक मुहिम भी चलाई है, 'फ्राईडे फॉर क्लाइमेट चेंज'। आपको रोज-रोज सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं है, बस हफ्ते के शुक्रवार को सरकार को याद दिलाना है। जब 21 सितंबर 2019 को ये मुहिम शुरू हुई तो ये एक आंदोलन बन गया। हर बड़े शहर में हजारों लोग जुटे। सिडनी और मेलबर्न में तो 80 हजार लोग एक जगह जुटे। दिल्ली, जिसे चलता हुआ शहर कहते हैं। जहां किसी को किसी से लेना-देना नहीं होता है। लेकिन उस दिन हजारों लोग जुटे और सड़क पर निकल पड़े। मैं खुद उस मार्च में शामिल था, उस दिन मुझे लगा कि भीड़ अच्छा काम भी कर सकते हैं। चारों ओर नारे गूंज रहे थे, हमें चाहिए आजादी, सूखे से आजादी, प्रदूषण से आजादी, क्लाइमेट चेंज से आजादी। इस मार्च का सबसे खूबसूरत दृश्य था, दो छोटे-छोटे बच्चे। जो शायद क्लाइमेट चेंज के बारे में सही से समझते भी न हो लेकिन वो इस मुहिम में साथ खड़े थे।

कुछ लोग समझते होंगे कि इससे क्या ही होगा? हो सकता है कि इससे कुछ न हो, हो सकता है यहां आने वाले बहुत से लोग खुद प्रदूषण करते होंगे। लेकिन ये भी सच है कि जब तक लोग जुटते नहीं, सरकार कुछ करती नहीं। जब यहां लोग आएंगे तो कुछ तो पर्यावरण के प्रति, इस समय की स्थिति के बारे में जरूर समझेंगे। तब वो शायद अगली बार ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो पर्यावरण के लिए अच्छा न हो। ग्रेटा की इसी मुहिम की वजह से पूरी दुनिया में पर्यावरण की बहस चल पड़ी है। सब विकास के नाम पर हो रहा है लेकिन ये क्यों नहीं समझते कि ये पर्यावरण भी विकास है। इसे बचाना जरूरी है, बेहद जरूरी।

Thursday, September 5, 2019

जलवायु संकट पर बात क्यों?

पहले गर्मी आई तो हम पूरी दुनिया की आबोहवा की बात करने लगे। हमने देखा कि कैसे उत्तराखंड के जंगल धधक रहे थे। अखबारों में आए दिन कहा जाता रहा कि ये साल का सबसे गर्म दिन रहा। ये भी कहा गया कि इस साल की गर्मी ने 128 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। गर्मी आती है तो हमें एक और समस्या से जूझना पड़ता है पानी की समस्या से। हर बार हम बुंदेलखंड और महाराष्ट्र में सूखे की समस्या को सुनते थे। लेकिन इस बार पानी की समस्या से पूरा देश जूझा। आखिर ये सब क्यों हो रहा है? क्यों चीजें हमारे नियंत्रण से बाहर जा रही हैं? क्यों जलवायु संकट का विषय हमारे अस्तित्व का विषय बन गया है?


जब आइसलैंड का पहला ग्लेशियर ओकोजुकुल खत्म हो जाए तो जलवायु परिवर्तन पर बात होनी चाहिए। जब विश्व को 20 फीसदी ऑक्सीजन देने वाला अमेजन के जंगल में आग धधकने लगे तो जलवायु संकट एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। जब 14 साल की लड़की स्कूल न जाकर क्लाइमेट चेंज पर संसद के सामने धरने पर बैठ जाती है तो ये विषय जरूरी लगता है। जरा सोचिए ऐसा क्यों हो रहा है? इसकी वजह हैं, हम और हमारा विकास।
इस कथाकथित विकास की वजह से ही ये सब हो रहा है। मैं कुछ दिनों पहले ही उत्तराखंड गया था। उत्तराखंड प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ राज्य है। इस राज्य की सबसे बड़ी समस्या है रोजगार। इसी वजह से यहां के लोग उत्तराखंड के लोग पलायन कर रहे हैं और शहरों की ओर लौट रहे हैं। सरकार इसके समाधान के लिए विकास ला रही है और अब उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण का काम जोरों पर है। हरिद्वार से लेकर देवप्रयाग तक सड़क अच्छी की जा रही है और पहाड़ को तोड़ा जा रहा है। जिससे जो पहाड़ पहले खूबसूरत दिखते थे, वो अब बंजर लगते हैं। अगर यही हाल रहा तो पूरा उत्तराखंड बंजर लगने लगेगा। ये तो बस विकास एक पैमाना है। इसके अलावा उद्योग भी एक बड़ा फैक्टर है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है।

पूंजीवाद विकास


भारत कृषि प्रधान देश है, आज भी देश की 60 फीसदी आबादी खेती ही करती है। शहर उद्योगों की तरफ भाग रहे हैं और गाँवों में खेती की जाती है। उद्योगों को चलाने के लिए पहले तो भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है फिर उसका जो वेस्ट मटेरियल होता है वो नदियों में जाकर गिरता है। अभी बरसात है तो दिल्ली में अभी यमुना साफ दिखेगी। कुछ दिन बाद देखना यही पवित्र और स्वच्छ यमुना काली नदी के के रूप में दिखेगी। मुझे अच्छी तरह से याद है इसी साल मई में जब पूरा देश पानी की समस्या से जूझ रहा था, उसमें गुजरात भी शामिल था।
गुजरात में पानी की कमी का हाल कुछ ऐसा था कि गावों में हर रोज पानी का टैंकर सरकार भेज रही थी। कहीं-कहीं तो पानी का टैंकर हफ्ते में एक बार जा रहा था। पानी की संकट की ही वजह से गुजरात मॉडल फेल होता दिखाई दे रहा था। गुजरात में पानी की समस्या इतनी बढ़ गई थी मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने आकर इस पर दखल दिया था। मुख्यमंत्री ने बताया था कि राज्य सरदार सरोवर डैम को छोड़ दिया जाए तो किसी भी बांध में पानी नहीं बचा है। तब उद्योगों को आदेश दिया गया था कि उनको उपयोग किया हुआ पानी दिया जाएगा। शायद यही विकास है जो एक न एक दिन ढ़र्रे पर आ ही जाता है।

जल संकट


हम समझते हैं कि जल संकट का मतलब है पानी की कमी।जल संकट सिर्फ पानी की कमी ही नहीं है, पानी की हद से ज्यादा अधिकता भी जलसंकट है। जलवायु संकट की ही वजह से ये देश सूखा और बाढ़ की ओर एक साथ बढ़ रहा है। जब बारिश नहीं हो रही थी तब देश के आधे राज्य सूखे की समस्या झेल रहे थे। चेन्नई, गुजरात, महाराष्ट्र और हैदराबाद इन सबमें शामिल थे। आपने चेन्नई की वो तस्वीर देखी ही होगी। जिसमें एक तस्वीर पिछले साल की थी, जिसमें पानी ही पानी दिख रहा थी। दूसरी तस्वीर में चेन्नई का पानी गायब हो चुका था। पानी के चारों तरफ बसा ये शहर अब पानी से जूझ रहा है।
जब बारिश हुई तो पूरा देश दो समस्याओं से घिर गया। एक बाढ़ से और दूसरी सूखे से। बिहार के कुछ जगह बाढ़ से परेशान थीं तो दूसरी तरफ उसी बिहार में सूखा भी पड़ रहा था। नर्मदा का स्तर तो इतना बढ़ चुका है कि कई गाँव के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की सूत्रधार मेधा पाटेकर यहां के लोगों के लिए अनशन पर बैठ गईं। ऐसे ही कई राज्य बाढ़ से जूझ रहे हैं। वहीं बारिश के बाद भी पानी की कमी बनी हुई है। सबने बाढ़ पर ध्यान दिया लेकिन उस पानी को संरक्षित करने पर किसी का ध्यान नहीं गया।
प्रधानमंत्री ने भी बस मन की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। सरकार नल से जल की नीति तो ला रही है। लेकिन जब जमीन के नीचे पानी ही नहीं होगा तो सब घर पानी कैसे पहुच पाएगा। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2021 तक देश के 20 बड़े शहरों का ग्राउंड वॉटर खत्म हो जायेगा। हमने पानी संरक्षण किया नहीं इसलिए उसका नतीजा कुछ दिनों बाद मिल ही जाएगा। जब हम पानी की समस्या से फिर से जूझ रहे होंगे। इन सब पर गौर कीजिए और थोड़ा समझिए कि जलवायु परिवर्तन पर बात करना क्यों जरूरी है?

शकुंतला देवी किसी गणितज्ञ से ज्यादा मां-बेटी के रिश्ते की कहानी लगती है

तुम्हें क्यों लगता है औरत को किसी आदमी की जरूरत है। एक लड़की जो खेलते-खेलते गणित के मुश्किल सवाल को झटपट हल कर देती है। जो कभी स्कूल नहीं गई ...