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Thursday, March 14, 2019

वो सियासी फैसला जिसके कारण इंदिरा-फिरोज के रिश्ते में कलह पड़ी

साल 1952

रायबरेली की चिलचिलाती धूप में एक तांगा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उसमें एक महिला अपने पति के लिये वोट मांग रही है। वो तांगे से उतरती है और लोगों से मुस्कुराकर वोट देनी की अपील करती है। महिला का सिर पल्लू से ढंका हुआ है। ये महिला इंदिरा गांधी थी जो अपने पति फिरोज गांधी के लिये चुनाव प्रचार कर रहीं थीं। फिरोज-इंदिरा अब सियासत के गलियारे में आ गए थे। यही सियासत दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बनाने वाली थी। यही सियासत इंदिरा गांधी से ऐसा फैसला करवाने वाली थी जो उनके और फिरोज के बीच कलह की वजह बनने वाली थी।
Related imageइंदिरा लखनऊ से नई दिल्ली आकर रहने लगी थीं। शुरूआत में इंदिरा तीन मूर्ति भवन को घर बनाने में लग गईं। वे भोजन की व्यवस्था करतीं और कार्यक्रमों का आयोजन करवाती। वे अपने पिता की कुशल प्रबंधक बन गईं। जवाहर लाल नेहरू विदेश जाते तो साथ इंदिरा भी होतीं। उनको दिल्ली की जिंदगी अच्छी लगने लगी थी। तीन मूर्ति के बारे में इंदिरा गांधी ने लिखा-
‘‘ऐसे लंबे-चौड़े कमरे, दूर तक जाते गलियारे! क्या इनको कभी रहने लायक बनाया जा सकता था? क्या इनमें घर जैसा महसूस किया जा सकता था? यदि किसी को कोई काम करना हो तो बेहतर है कि उसे बढ़िया ढंग से करे, इसलिए मैं उसी में रम गई।’’
1952 में वे राजनीति में तो आईं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। उन्होंने फूलपुर में अपने पिता के लिए प्रचार किया और रायबरेली में अपने पति के लिये। उनके इस हुनर से जवाहर लाल नेहरू काफी प्रभावित हुये। उनको कभी नहीं लगा था कि उनकी बेटी राजनीति में आने की इच्छा रखती है। लेकिन अभी वे प्रचार में व्यस्त थीं। 1952 में उन्होंने अपने पति को जिताने के लिए जबरदस्त चुनाव प्रचार किया। फिरोज चुनाव जीतकर ससंद पहुंच गये। यहां से फिरोज में एक बड़ा बदलाव आया। हमेशा पीछे बैठने वाला फिरोज संसद में पहुंचकर तेजतर्रार हो गया। वे नेहरू खेमे में वामपंथी थे वैसे ही जैसे 1940 के दौर में जवाहर लाल नेहरू थे।
1955 में फिरोज गांधी ने जीवन बीमा कारोबार में अवैध सौदों का खुलासा किया और सरकार को उसका राष्ट्रियकरण करने पर मजबूर कर दिया। वे संसद में जितने मुखर थे दिल्ली के घर में उनको उतनी ही घुटन होती थी। उनको प्रधानमंत्री का दामाद कहलवाना पसंद नहीं था। फिरोज की सफलता के कारण इंदिरा-फिरोज में प्रतिस्पर्धा होने लगी और दोनों के रिश्ते बिगड़ते गये। एक तरफ संसद में फिरोज का कद बढ़ रहा था तो इंदिरा गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। 1955 में इंदिरा गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य बन गईं। एक साल बाद उनको उसी कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया। धीरे-धीरे उनका कद बढ़ता ही जा रहा था। 1958 में वे केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की अध्यक्ष बन गईं।
Image result for indira gandhi 1960जो लोग कहते हैं कि इंदिरा के राजनीति में आने से पंडित नेहरू की भूमिका थी या वे इस फैसले से खुश थे, उनको ये बात ध्यान से सुननी चाहिये कि जवाहर लाल नेहरू वंशवाद के विरोधी थे। उन्होंने कभी इंदिरा से नहीं कहा कि तुम राजनीति में आओ। जीबी पंत के जोर देने पर इंदिरा गांधी 1959 में कांग्रेस की अध्यक्ष बन गईं। तब जवाहर लाल का कहना था-
‘सामान्यतः यह ठीक नहीं है कि मेरे प्रधानमंत्री रहते मेरी पुत्री कांग्रेस अध्यक्ष बन जाए।’
इंदिरा गांधी के राजनैतिक उफान से पति-पत्नी बहुत दूर हो गये थे। अब वे एक-दूसरे के विरोधी हो गये थे। अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी का कार्यकाल असरदार रहा। भाषाई आधार पर राज्य बंट रहे थे। हालांकि नेहरू उसके विरोध में थे। बाॅम्बे स्टेट से दो राज्य निकले गुजरात और महाराष्ट्र। लेकिन उनका एक फैसला ऐसा भी था जिसके खिलाफ नेहरू भी थे और फिरोज भी।
1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई। इस जीत ने पूरे देश को हैरत में डाल दिया। भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी। केरल में माहौल बदलने लगा था स्कूलों में गांधीजी की जगह मार्क्स की तस्वीरें दिखाई देने लगीं थीं। कांग्रेस को लगा इसको रोकना ही होगा। इंदिरा गांधी ने शिक्षा विधेयक की हित को नुकसान होने के आधार पर केरल सरकार को बरखास्त कर दिया। इंदिरा गांधी ने तब दिखा दिया था कि वे सत्ता के लिए निरंकुश हो सकती हैं। कुछ दशक बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के तौर पर एक बार फिर से सत्ता के लिए निरंकुश होने वाली थीं। लेकिन अभी नेहरू काल की बात करते हैं।
Image result for indira gandhi 1960केरल में फिर से चुनाव हुये। इस बार कम्युनिस्टों की हार हुई और इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत हुई। इंदिरा गांधी इस जीत से बहुत खुश थीं। लेकिन नेहरू और फिरोज इस फैसले से खुश नहीं थे। ये एकमात्र मौका था जब नेहरू और फिरोज की राय एक जैसी थी। सर्वपल्ली गोपाल ने बताया कि वो ऐसा फैसला था जिसने नेहरू की प्रतिष्ठा को कलंकित किया और उनकी स्थिति कमजोर हुई। केरल के फैसले के कारण इंदिरा और फिरोज के बीच गंभीर वैवाहिक कलह पैदा हो गई। फिरोज अपनी पत्नी के इस फैसले से बहुत गुस्से में आ गये। उस गुस्से का एक वाकया सुनिये।
केरल के मामले पर नेहरू-गांधी परिवार में नाश्ते के मेज पर चर्चा हुई। फिरोज ने इंदिरा से कहा- ‘यह कतई उचित नहीं है। तुम लोगों को धमका रही हो। तुम फासीवाद हो।’ इंदिरा, फिरोज की इन बातों से तमतमा गईं। वे नाश्ते को बीच में ही छोड़कर कमरे से निकल गईं और बोलीं-
‘तुम मुझे फासीवाद कह रहे हो, मैं ये कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती।’
1959 में इंदिरा ने डोरोथी नाॅर्मन को फिरोज के बारे में लिखा-
‘मुसीबतों का विशाल सागर मुझे निगलता जा रहा है। फिरोज मेरे अस्तित्व से हमेशा रूष्ट रहे हैं। चूंकि अब मैं अध्यक्ष बन गई हूं तो वे और दुश्मनी दिखा रहे हैं। सिर्फ मेरी मुश्किलें बढ़ाने के लिये साम्यवादियों की तरफ झुकते चले जा रहे हैं और कांग्रेस को मजबूत करने के लिये मेरी मेहनत पर पलीता लगा रहे हैं।’
इन सबसे परेशान होकर इंदिरा ने कांग्रेस अध्यक्ष से इस्तीफा दे दिया। वे अपने पति और बच्चों के साथ कश्मीर घूमने चली गईं। वहां उन्होंने तय कर लिया कि वे अब राजनीति छोड़कर अपने पति के साथ रहेंगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि वो ऐसा नहीं कर पाईं। वो ऐसा इसलिए नहीं कर पाईं क्योंकि वो जिसके लिये राजनीति छोड़ना चाहती थीं। वो 8 सितंबर 1960 को उनकी दुनिया से चला गया। फिरोज गांधी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। इंदिरा तब फफक-फफक कर रोईं। लेकिन इंदिरा को कई और मौतें देखनी थी और उन पर आंसू बहाने थे। ये इंदिरा और फिरोज की कहानी थी जो प्रेम के साथ शुरू हुई थी और उसका अंत टकराव से हुआ।
इन्दिरा-फिरोज के जीवन का यह वाकया सागरीका घोष की किताब इन्दिरा से लिया गया है।

Friday, March 8, 2019

जवाहर लाल नेहरू का वो फैसला जिसने इंदिरा-फिरोज को अलग कर दिया था।

एक देह सामने पड़ी हुई है। उसके बगल में ही सफेद साड़ी में एक औरत बैठी हुई है। जो बिलख-बिलखकर रो रही है। वहीं हजारों लोग भी खड़े थे जो उस व्यक्ति के अंतिम दर्शन करना चाहते थे। उस भीड़ को देखकर सबसे बड़ा व्यक्ति बोला- मुझे नहीं पता था कि ये लोगों में इतना लोकप्रिय था। ये कहना वाला शख्स देश का प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू है और जो लाश पड़ी है वो उनके दामाद फिरोज गांधी की है। वहीं सफेद साड़ी में बिलखने वाली औरत इंदिरा गांधी हैं। आज बात इंदिरा-फिरोज के विरोधी रूप की जिसकी वजह जवाहर लाल नेहरू का एक पत्र बना।

फिरोज और इंदिरा गांधी का विवाह 26 मार्च 1942 को हुआ। उनकी शादी के 6 महीने बाद ही दोनों भारत छोड़ो आंदोलन में जेल भी गये। जेल से रिहा होने के बाद दोनों आनंद भवन में रहने लगे। जल्दी ही दोनों ने एक बेटे को जन्म दिया। 20 अगस्त 1944 को मुंबई में उनकी पहली संतान राजीव रत्न बिरजीस नेहरू गांधी का जन्म हुआ। राजीव का ये नाम इसलिये रखा गया ताकि याद रखा जाये कि वो जितना फिरोज का बेटा है। उतना ही वो नेहरू का पोता है। तब जवाहर लाल नेहरू जेल में थे। उन्होंने जेल से इंदिरा गांधी को लिखा-

‘‘नेहरू को अतिरिक्त नाम की तरह जोड़ दिया जाए तो कैसा रहेगा। नेहरू गांधी नहीं वो मूर्खतापूर्ण लगता है। बल्कि नेहरू अतिरिक्त नाम के रूप में।’’

इंदिरा अक्सर कश्मीर जाया करती थीं। वे जब भी परेशान होती कश्मीर आ जाया करती। वो कश्मीर में अपने बेटे राजीव और पति फिरोज के साथ थी। तब सूचना मिली की जवाहर लाल नेहरू को जेल से रिहा कर दिया गया है। जवाहर लाल नेहरू को 15 जून 1945 को रिहा किया गया। तब इंदिरा अपने पति और बेटे को छोड़कर अपने पिता के पास जाना चाहती थीं। इंदिरा को लगा कि इस समय उनको अपने पिता के साथ होना चाहिये। जब फिरोज ने कहा कि तुम्हारे जाने से क्या होगा? तो वो बोली मुझे नहीं पता, मुझे बस जाना है। यही इशारा बाद में इंदिरा को जवाहर लाल नेहरू के पास और फिरोज गांधी से दूर करने वाला था।
Related image1945 में आम चुनाव हुये। 102 सीटों के इस चुनाव में कांग्रेस 59 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इंदिरा ने तब अपने ‘पापू’ को लिखा-

‘‘मैं दिल्ली में आपकी और आपसे ज्यादा उस महान संगठन की, जिसके आप प्रतिनिधि हैं। इस जीत को अपनी आंखों से देखने के लिये बेहद तरस रही हूं।’’

1946 में फिरोज गांधी नेहरू परिवार का अखबार नेशनल हेराल्ड का संपादन संभालने लगे। दोनों पति-पत्नी हजरतगंज में आकर रहने लगे। फिरोज को बागवानी करने में मजा आता था और इंदिरा को गृहस्थ के काम करने में। लेकिन वो गृहस्थी शौकिया तौर पर करती थी। उसे हमेशा करने के लिये इंदिरा बनी भी नहीं थीं। इंदिरा ने इस शहर के बारे में अपने पिता को लिखा-
‘‘हमारे सूबाई शहर में एक अजब सी मुर्दनी छाई हुई है- भ्रष्टाचार और ढिलाई , माहौल को दुःखद बना रहे हैं। कुछ लोगों की आत्मसंतुष्टि, कुछ का कपट, जीवन में जरा-सी भी रवानगी नहीं है। यह अविश्वसनीय नहीं है कि फासीवाद के आडंबरपूर्ण जाल ने दसियों लाखों लोगों को आकर्षित कर लिया है। आरएसएस जमीन की तर्ज पर तेजी से मजबूत होता जा रहा है। अधिकतर कांग्रेसियों व सरकारी नौकरों का भी इन प्रवृत्तियों को समर्थन हासिल है।’’
इन दिनों फिरोज गांधी के अफेयर की खबरें आने लगीं। फिरोज के अखबार की तरफ ध्यान न देने के कारण अखबार चलाने में वित्तीय संकट आ गया। फिरोज के द्वारा पैसे के दुरूपयोग से इंदिरा नाराज थीं। इसी दौरान वे राजनेता अली जहीर के बेटी के साथ इश्क में पड़ गये। इस प्रेम संबंध ने इतना तूल पकड़ा कि नेहरू को खुद इसमें बीच में पड़कर रोकना पड़ा। इसी दौरान 14 दिसंबर 1946 को इंदिरा गांधी ने दूसरे बेटे को जन्म दिया, नाम रखा संजय। जो महाभारत से अंधे धृतराष्ट के सहायक के रूप में थे। आगे चलकर इसी संजय के लिये इंदिरा धृतराष्ट बनने वाली थीं।
Image result for jawahar lal nehru and indira gandhiजब आजादी की रात जवाहर लाल नेहरू देश के नाम संदेश दे रहे थे तब इंदिरा और फिरोज वहीं थे। लेकिन दोनों के होने में अंतर था। इंदिरा हर वक्त नेहरू के साथ थीं जबकि फिरोज गांधी को बाकी पत्रकारों के साथ बैठाया गया था। यहां से साफ हो रहा था कि नेहरू ने दो दिशा खींच दी थी जो आगे चलकर और तेज होने वाली थी। 30 जनवरी 1948 को देश ने अपने बापू की हत्या देखी। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू की सुरक्षा बढ़ा दी गई। तब नेहरू ने घर संभालने के लिये इंदिरा को बुलाया। इंदिरा गांधी तीन मूर्ति भवन में आ गईं जहां देश के प्रधानमंत्री रहते थे। इंदिरा के साथ उनके दोनों बेटे भी आ गये। अपने इस फैसले पर बाद में इंदिरा लिखती हैं-
‘‘अगर मैं नहीं आती तो मेरे पिता को बुरा लगता, मना करना बहुत कठिन था। यह बड़ी समस्या थी क्योंकि फिरोज के लिए स्वाभाविक था कि उन्हें मेरा जाना कतई पसंद नहीं आए।’’
वो फैसला इंदिरा गांधी और फिरोज के जीवन की दिशा बदल देना वाला था। वो फिरोज गांधी को एक सशक्त नेता और बेहतरीन राजनेता बना देने वाला था। जो संसद में खड़े होकर नेहरू को चुनौती देने वाला था। वो नेहरू के मुख्यमंत्री को गद्दी से उतार फेंकने वाला था। तीन मूर्ति भवन के इस फैसले से इंदिरा अपने पति से दूर जाने वाली थीं और अपने पति को अपना विरोधी समझने वाली थीं।
ये वाकया सागारिका घोष की किताब इंदिरा से लिया गया है।

Saturday, March 2, 2019

जब महात्मा गांधी ने इंदिरा और जवाहर लाल नेहरू के बीच सुलह करवाई थी

महात्मा गांधी, नेहरू परिवार के बड़े करीब थे। उनके सबसे प्रिय शिष्य नेहरू परिवार का बेटा था। वो बेटा जो विलायत और पश्चिमी सभ्यता का हिमायती था। जो आगे चलकर देश का नेतृत्व करने वाला था, जो आगे चलकर अपने बापू की मौत की खबर देने वाला था। महात्मा गांधी, नेहरू परिवार के कितने करीब थे। इस बात से पता चलता है कि आनंद भवन में महात्मा गांधी का भी एक कमरा था। वे अक्सर इलाहाबाद आते तो वहीं रूकते और बैठकों का दौर चलता। महात्मा गांधी नेहरू के लिये आदर्श थे और उनकी बेटी इंदिरा भी गांधी को देखकर ही बड़ी हो रही थी।

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इंदिरा गांधी को जवाहर लाल नेहरू ने पढ़ने के लिये विदेश भेज दिया। वहां उनकी एक लड़के से दोस्ती हुई, फिरोज गांधी। इंदिरा गांधी ने ऑक्सफोर्ड काॅलेज में एडमिशन ले लिया। इसलिये नहीं कि उनके पिता ने कहा था बल्कि वे उस शख्स के साथ रहना चाहती थी। जो उनके मां के बड़े करीब था। इंदिरा फिरोज को तब तक अपना मित्र की माना करती थीं। जब वे फिरोज के साथ समय बिताने लगीं तो दोस्ती प्यार में बदल गई। वो प्यार जो आगे जाकर पिता-पुत्री के बीच विरोध के रूप में सामने आने वाला था।

फिरोज-इंदिरा


फिरोज ने जब पहली बार इंदिरा गांधी से शादी का प्रस्ताव रखा। तब वे सिर्फ 16 साल की थीं। तब इंदिरा की मां कमला नेहरू ने मना कर दिया था। कमला का मानना था कि उनकी बेटी अभी बहुत छोटी है। 1939 में इंदिरा गांधी दोबारा लंदन गईं और फिरोज गांधी के कमरे केे पास ही अपना कमरा ले लिया। उसके 2 साल पहले ही फिरोज और इंदिरा गुपचुप तरीके से सगाई कर चुके थे। उस समय के बारे में पीएन हक्सर बाद में लिखते हैं- ‘ वे फिरोज और इंदिरा के लिये खाना बनाते थे। वे फिरोज के साथ खुश थीं। दोनों छोटे से कमरे में समय बिताते थे।’

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इंदिरा और फिरोज 1941 में डरबन होते हुये जहाज से भारत आये। इंदिरा सबसे पहले महात्मा गांधी से मिलने गईं। गांधी के आश्रम में वे सिल्क की साड़ी और लिपिस्टिक लगा कर गईं। जिसे महात्मा गांधी ने धोने को कहा और खादी की साड़ी पहनने को कहा। ये बात सुनकर इंदिरा गांधी का आश्रम से मोह भंग हो गया। उन्होंने महात्मा गांधी के आश्रम को गांधीवादी आडंबर का नाम दिया था। उन्हें लगता था कि बापू के पास देश के भविष्य का कोई खाका नहीं है।

नेहरू का विरोध


जवाहर लाल नेहरू फिरोज-इंदिरा के इस संबंध से खुश नहीं थे। इसलिये नहीं क्योंकि उनका धर्म अलग था। बल्कि उनका मानना था कि फिरोज और इंदिरा दोनों अलग सोच के हैं। नेहरू परिवार जिस सोच और पृष्ठभूमि में था, फिरोज उस दुनिया से अलग थे। जवाहर लाल नेहरू अपनी खानदानी इज्जत के लिये परेशान थे। उन्होंने तब इंदिरा गांधी को लिखा- ‘खराब स्वास्थ्य के बावजूद तुम्हारा यूरोप से वापस आना और अचानक शादी करना बेहद नासमझी की बात है।’

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पिता-पुत्री के संबंध जब खराब होने लगे। तब महात्मा गांधी को बीच में आना पड़ा। उन्हांेने जवाहर लाल नेहरू को समझाया- ‘फिरोज ने कमला नेहरू की बीमारी में उनकी सहायता की थी। वह उनके लिये पुत्र के समान था। यूरोप में इंदिरा की बीमारी के दौरान भी उसने मदद की थी। उन दोनों के बीच स्वभाविकता निकटता हो गई थी। उनको विवाह की स्वीकार्यता न देना निर्दयता होगी।’

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इसके बाद जवाहर लाल नेहरू मान गये और 26 मार्च 1942 को आनंद भवन में ही उनका विवाह हुआ। बाद में इंदिरा गांधी ने कहा- मैंने इस शादी को करके इस परिवार की सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ा था। मेरी शादी के खिलाफ हर कोई था। लेकिन मेरे लिये ये जीत स्वतंत्रता संघर्ष के बराबर थी। लेकिन जल्दी ही ये दंपत्ति उदासी में आने वाले थे और वजह इंदिरा गांधी के पापू को बनना था।

शकुंतला देवी किसी गणितज्ञ से ज्यादा मां-बेटी के रिश्ते की कहानी लगती है

तुम्हें क्यों लगता है औरत को किसी आदमी की जरूरत है। एक लड़की जो खेलते-खेलते गणित के मुश्किल सवाल को झटपट हल कर देती है। जो कभी स्कूल नहीं गई ...