Tuesday, April 28, 2020

फोर मोर शाॅट्स प्लीज चार आजाद ख्याल वाली लड़कियों की कहानी, थोड़ा सच, थोड़ा फसाना है

फोर मोर शाॅट्स प्लीज में चार लड़कियों की कहानी है जो अपने लिए इस समाज से, खुद से लड़ती रहती हैं। चारों बहुत अच्छी दोस्त हैं। लड़ाई, रोना-धोना, बंबई की फैशनबेल लाइफ, लव, ब्रेक अप, सेक्स और स्ट्रगल को दिखाने की कोशिश की गई है। लड़कियां इस समाज को कैसे देखती हैं और ये समाज उनके साथ कैसा बर्ताव करता है। ये इन चार लड़कियों के किरदार से दिखाने की कोशिश की गई। फोर मोर शाॅट्स का दूसरा सीजन हाल ही में आया है। पहला सीजन 2019 में आया था। दूसरा सीजन वहीं से शुरू होता है, जहां पहला सीजन खत्म हुआ था। 10 एपिसोड का ये सीजन अमेजन प्राइम पर रिलीज किया गया है और इसके डायरेक्टर हैं अनु मेनन और नुपूर अस्थाना।


मुंबई में रहने वाली चार लड़कियों की ये कहानी है! अंजना, दामिनी, सिद्धि और उमंग। चारों अलग-अलग बैकग्राउंड की हैं। अंजना एक वकील हैं। तलाक हो चुका है और एक बेटी है। अंजना मूव आॅन करने कीे कोशिश करती है लेकिन फिर से शादी और फैमिली के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती। यही मूव आॅन उसके लिए बहुत सारी उलझने खड़ी कर देता है। अंजना का रोल निभाया है कीर्ति कुल्हाड़ी ने। दामिनी एक पत्रकार हैं। जिनको पहले सीजन में उनकी ही कंपनी से निकाल दिया गया था। अब वे किताब लिख रही हैं जिसको कोई छाप नहीं रहा है। किताब की तरह ही उनकी पर्सनल लाइफ में भी दिक्कतें आती ही रहती हैं। दामिनी के कैरेक्टर में हैं शायोनी गुप्ता।

सिद्धि पटेल, जिसकी पहली सीजन में मां विलेन थी तो इस सीजन में दोस्त बन गई हैं। पहले सिद्धि कुछ नहीं करती थी लेकिन अब अपने आपको खोज लिया है। ये रोल किया है मानवी गगरू ने। उमंग जो बाईसेक्सुअल है। पेशे से एक जिम ट्रेनर हैं। जो पहले सीजन में एक्ट्रेस समारा कपूर की पर्सनल ट्रेनर बन जाती है। बाद में दोनों प्यार में पड़ जाते हैं। बाइसेक्सुअल को ये समाज और सोशल मीडिया कैसे देखता है? उनको किन दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है।ये दूसरे सीजन में बताने की कोशिश की गई है। उमंग को रोल किया है गुरबानी ने। इसके अलावा कई और किरदार हैं। जय एक बार चलाता है। आमिर वारसी एक डाॅक्टर है और शशांक एक वकील। ऐेसे ही कुछ नए पुराने किरदार आते जाते रहते हैं। जय एक बाॅर चलाता है, ट्रक बार। जो इन चारों लड़कियों का अड्डा है। जब भी इनकी लाइफ में कुछ अच्छा और बुरा होता है। वे इसी बार में मिलते हैं।



इस सीजन में समस्याएं और बड़ी हो गई हैं, मेलो ड्रामा भी काफी बढ़ गया है। सीरीज में इन लड़कियों के कैरेक्टर्स से बहुत कुछ दिखाने की कोशिश की गई है। महिलाओं की इच्छाएं, उनकी समस्याएं, सैक्स कोई टैबू नहीं है, फेमनिज्म, पत्रकारिता और एलजीबीटीक्यू जैसे मुद्दों को दिखाने कीे कोशिश की गई है। हो सकता है ये देखकर आपको लगे कि वास्तव में ऐसी महिलाएं न हो और न ही उनकी लाइफ ऐसी हो। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। मगर फिर एंटरटेनमेंट के हिसाब से ये वेब सीरीज काफी अच्छी है। पहले सीजन से दूसरा सीजन काफी इंटेंस है। सबकी लाइफ में खुशी कम, बुरी खबर जल्दी आ जाती है। फिर भी ये दोस्ती नहीं तोड़ेंगे वाली यारी इन चारों के बीच बनी रहती है।

कई लोगों को लग सकता है इसमें अश्लीलता और फूहड़पन है। लेकिन आज जरूरत है है इस पर खुल कर बात करने की। सेक्स के बारे में खुल के बात करना तो अच्छी बात है। अगर आप सेक्स के बारे में बात करने से कतराते हैं तो ये वेब सीरीज आपको जरूर देखनी चाहिए। हर एपिसोड के शुरू होने से पहले कुछ वाॅयस ओवर चलता है। जब वो एपिसोड खत्म होता है तो उस वाॅयस ओवर का मतलब समझ में आता है। पहले सीजन की तरह ही इस सीजन में भी बैकग्राउंड म्यूजिक अंग्रेजी गानों का है। जो समझ में आए न आए सुनने में बेहद अच्छा लगता है। कुछ एपिसोड में स्टैंड अप काॅमेडी का तड़का लगता है जो कुछ हद तक गुदगुदाने का काम करती है। जिन्होंने पहला सीजन देखा है उनको ये सीजन भी पसंद आएगा। जिन्होंने अब तक फोर मोर शाॅट्स प्लीज नहीं देखी है वो देखने को मन बना लें, अच्छी लगेगी।


फोर मोर शाॅट्स प्लीज।

इन चारों की लाइफ कितनी ही खराब क्यों न हो? इनके दोस्त हमेशा इनके साथ खड़े रहते हैं। एक-दूसरे को समझाते है, हल बताते हैं और मजाक तो चलता ही रहता है। चाहे फिर ब्रेक अप की बात हो या किसी गिल्ट की। बेस्ट फ्रेंड का ज्ञान और सीख इस वेब सीरीज में खूब दिया जाता है। पहले सीजन की तरह दूसरे सीजन में भी अंत ऐसी जगह पर छोड़ा गया है जिससे लगता है कि अगला सीजन भी आ सकता है। आपको ये वेब सीरीज अच्छा लगे न लगे एंटरटेनर जरूर लगेगा और आपको इस मूवी का ये डायलाॅग तो याद ही रहेगा ‘जय, फोर मोर शाॅट्स प्लीज’।

Sunday, October 6, 2019

आरे काॅलोनीः रात के अंधेेरे में अंधेर नगरी में एक हत्याकांड

हम सभी का मानना है कि प्रकृति के बीच रहने के कई फायदे होते हैं। तन और मन हमेशा तरोताजा रहते हैं, ऐसा मैं नहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं। लेकिन हमारा देश न जाने किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर्यावरण को बचाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुंबई की आरे काॅलोनी में पेड़ काटे जा रहे हैं। कहा जाता है कि एक पेड़, 100 बेटों के बराबर होता है। मतलब बेटे जितना नहीं करते, उससे ज्यादा फायदा इन पेड़ों से होता है। कहा जाता है कि एक पेड़ एक साल में करीब 117 किलोग्राम ऑक्सीजन देता है और करीब 20 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। 4 डिग्री तापमान को नियंत्रण करता है और कई खतरनाक तत्वों को सोखता है। इसके अलावा हमें इन पेड़ों से चारा मिलता है, फल मिलते है और लकड़िया भी मिलती हैं। से सब बताते हैं कि पेड़ हमारे लिए कितने फायदेमंद हैं। ये अच्छे से समझ लेना चाहिए कि अगर हम पेड़ों को काट रहे हैं तो खुद के जीवन को कम कर रहे हैं।


विकास बनाम पर्यावरण


बिना पेड़ों के जीवन संभव नहीं है कि लेकिन अपने ऑफिस मेंं मजे से बैठे सरकार के मंत्रियों को ये बात कभी समझ नहीं आएगी। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर पेड़ों के संरक्षण के लिए नहीं, पेड़ों के कटने के समर्थन में बयान दे रहे हैं। पेड़ों को काटने की वजह है, मुंबई मेट्रो। हर बार यही शहरीकरण और आधुनिकता के लिए हम पेड़ों को काटते जाते हैं। लेकिन मेरे ख्याल से इसे पेड़ काटना नहीं, पेड़ो की हत्या कहा जाना सही होगा। वर्ना रात के पहर में चोरों की तरह क्यों पेड़ काटे गए?  हमेशा जागने वाली मुंबई शायद इस रात सो गई थी। सोचिए क्या हाल होगा? जब सरकार आपके घर को बुल्डोजर से तोड़ रही हो और आप कुछ न कर पा रहे हों, सिवाय बिलखने के। वैसा ही हाल मुंबई के आरे काॅलोनी का था।

अब सबको समझ जाना चाहिए ये नया भारत कहने वाले, पेड़ों के नहीं हैं, पर्यावरण के नहीं है। इन्हें तो बस विकास चाहिए। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर कहते हैं, जब दिल्ली में मेट्रे स्टेशन बनना था। तब 20-25 पेड़ काटे जाने थे, तब भी विरोध हुआ था। दिल्ली में 271 मेटो स्टेशन बनाए गए हैं और पेड़ों की संख्या भी बढ़ी है।’ मंत्री साहब भूल जाते हैं कि दिल्ली और मुंबई में कितना अंतर है? दिल्ली में पहले से ही बहुत पेड़ हैं और मुंबई की आरे काॅलोनी इकलौता बचा जंगल है। आप कह रहे हैं कि पेड़ काटकर हम पौधे लगायेंगे। पौधे को बड़ा पेड़ बनने में 5 साल तो लग ही जाते हैं। तब तक क्या मुंबई बिना पेड़ों की रहेगी?

सोशल मीडिया पर बोलती प्रबुद्धता


मुंबई में देश के सबसे प्रबुद्ध लोग रहते हैं लेकिन इनकी बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ सोशल मीडिया और सिनेमा पर ही 
दिखाई देती है। वो प्रबुद्ध लोग जब रात को आराम से नींद ले रहे थे, तब आरे काॅलोनी में आरी चलाई जा रही थी। तब कुछ लोग थे जो इस कटाई का विरोध कर रहे थे। शायद इन लोगों को पता नहीं था कि ये सब विकास के लिए हो रहा था। तभी तो 38 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और इलाके में धारा 144 लगा दी गई है। मैंने अब तक कश्मीर में हिंसा पर, 370 का एक भाग हटाने पर, दिल्ली में किसानों की रैली पर, जाट आरक्षण पर धारा 144 लगते देखी थी। मैं पहली बार देख रहा हूं कि पेड़ों को काटने के लिए धारा 144 लग रही है।


मुंबई के गोरेगांव में बसी आरे काॅलोनी इस महानगर की सबसे हरी-भरी जगह है। 16 वर्ग किमी. में स्थित यह एक हरित पट्टी है। जो 1949 में दूध देने वाले पशुओं को रखने के लिए बनाई गई थी। इसके एक छोर पर संजय गांधी नेशनल पार्क है तो दूसरी ओर पवई लेक, तुलसी लेक और विहार लेक जैसी तीन बड़ी झीलें हैं। अगर इन पेड़ों को काटा गया तो जल्दी ही ये तीन बड़ी झीलें भी खत्म हो जाएंगी। जल संकट का एक बड़ी वजह पेड़ों का खत्म होना भी है। पेड़ों को काटकर पौधारोपण करना कोई समाधान नहीं है। अगर आप ऐसा कुछ करना ही चाहते हैं तो पौधों को लगाकर पेड़ बन जाने दीजिए, उसके बाद उन पुराने पेड़ों को काटिए जिनको आप काटना चाहते हैं। तब आपकी बात न्यायसंगत लगेगी।

हाई कोर्ट बड़ा या सुप्रीम कोर्ट?


ये सब हुआ मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले से। जिसमें उन्होंने कहा कि मुंबई महानगरपालिका के वृक्ष प्राधिकरण का मेट्रो-3 के लिए वृक्षों की कटाई का फैसला पूरी तरह से सही है। हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए दायर जोरू बाथेना की याचिका खारिज की दी। मुंबई की मेट्रो के काम के लिए आरे काॅलोनी के 2,464 पेड़ काटे जाने हैं। फैसला आते ही शाम को पेड़ों को काटना शुरू कर दिया गया। मामला फिर भी अभी तक सुलझा नहीं था। मुंबई हाईकोर्ट ने तो फैसला सुना दिया लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है। यही मामला एनजीटी में भी चल रहा है। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से कब से बड़ी हो गई? पुलिस को आम लोगों की बजाय उन पेड़ काटने वालों को गिरफतार करना चाहिए।

मुझे नहीं पता कि इस मेट्रो से किन लोगों को फायदा होने वाला है। देश के सबसे पूंजीपतियों को या देश की जनता को जैसा सरकार हर योजना पर कहती है। लेकिन ऐसे विकास क्या ही फायदा जो हमारे आने वाले भविष्य को खत्म कर रहा है? हमारी मौलिकता को खत्म कर रहा है। नेता भाषणों में तो दुनिया बदलने की बात कहते हैं लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है तो सबसे पीछे अंगड़ाई ले रहे होते हैं। फाॅरेस्ट रिर्सोसेज आंकलन के अनुसार, 1990 और 2015 के बीच दुनिया भर में जंगल 31.6 फीसदी से घटकर 30 फीसदी पर जा पहुंचे हैं। हम दुनिया को बताते हैं कि हम हरे-भरे देश हैं लेकिन अंदर ही अंदर हम इस हरियाली को खत्म करने पर तुले हुए हैं।


पेड़ो को खत्म करके ऊंची-ऊंची इमारत बना सकते हैं, लंबी-लंबी मेट्रो बनाकर खुश हो सकते हैं। लेकिन इस विकास में एक कमी तो है, लोगों की भलाई। पेड़ सिर्फ हरियाली के लिए नहीं होते हैं, उनसे बारिश होती है, ऑक्सजीन आती है और काॅर्बनडाईआक्साइड जाती है। दुनिया भर की सरकारें विकास के नाम पर आरे काॅलोनी की तरह पेड़ों को काट रही हैं। हर साल हम 1 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर वनों को खो देते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर वापस लौटना बहुत मुश्किल हो जाएगा। हमारे इसी रवैये की वजह से पेड़ हमसे दूर हो रहे हैं। अभी भी समय है हमें पर्यावरण के लिए गंभीर हो जाना चाहिए। अन्यथा भविष्य तो दूर की बात है, वर्तमान भी संकट में आ जाएगा।

Tuesday, September 24, 2019

ग्रेटा थनबर्ग की इन बातों पर ध्यान दें!

यूएन का सम्मेलन चल रहा है। विश्व भर के बड़े-बड़े नेता यहां बैठे हैं। उन्हीं के बीच बैठी है एक 16 साल की लड़की। 16 साल की ये लड़की सबको सुनती है और फिर बोलती है। वो लगभग चीखते हुए बोलती है, ‘ये सब गलत है। मुझे यहां नहीं होना चाहिए। मुझे तो इस समुन्दर के पार अपने स्कूल में होना चाहिए। आप सभी मेरे पास एक उम्मीद लेकर आए हैं। आपकी हिम्मत कैसे हुई? आपने अपने खोखले शब्दों के लिए मुझसे मेरे सपने और बचपन को छीन लिया है। लोग परेशान हो रहे हैं, मर रहे हैं। पूरा इको-सिस्टम खराब हो रहा है और आप विकास के नाम की जादुई कहानी सुनाने में लगे हैं। आपकी हिम्मत कैसे हुई? ये बातें बोल रही थी एक लड़की जिसके साथ आज लाखों लोग खड़े हैं। जिसने पूरी दुनिया को बताया कि अब समय आ गया है। जब हम खड़े हों और विरोध करें। इस 16 साल की लड़की का नाम है ग्रेटा थनबर्ग।


ग्रेटा उन सभी लोगों से ज्यादा समझदार है जो ऑफिस में बैठकर प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग पर अफसोस जताते हैं। ग्रेटा थनबर्ग को आज हर कोई जानता है, जिसे बोलने के लिए यूएन बुला रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्रेटा घर से निकली और हर कोई सुनने लगा। आज जब ग्रेटा कुछ बोलने के लिए खड़ी होती है तो लाखों लोग सुनते हैं। लेकिन एक साल पहले ग्रेटा अकेली थी। वो स्वीडन की गलियों में, संसद के बाहर अकेले एक बोर्ड के साथ खड़ी रही। वो हर शुक्रवार को यहां आतीं और यही काम करतीं। तब ग्रेटा का साथ न ही उनके माता-पिता दे रहे थे और न ही उनके दोस्त। उसी 15 साल की लड़की की वजह से ब्रिटेन में लाखों लोग सड़क पर उतर आए। जिस वजह से ब्रिटेन की संसद को क्लाइमेट इमरजेंसी लगानी पड़ी। ब्रिटेन ऐसा करने वाला पहला देश बन गया। तब पहली बार दुनिया ने ग्रेटा के बारे में सुना। ग्रेटा कार्बन के उत्सर्जन को कम करने की बात कहती हैं। वो सिर्फ कहती ही नहीं है, करती भी हैं। ग्रेटा हवाई जहाज से सफर नहीं करती हैं। वो सड़क और पानी के रास्ते हर जगह जाती हैं। वो अपनी उम्र के लोगों से अपील करती हैं कि अब हमें ही इस समस्या से लड़ना होगा।

वो इस सम्मेलन में करीब-करीब रोते हुए बोलती हैं, 'आप कहते हैं कि आप सुन रहे हैं। लेकिन आपको कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम कितने दुखी हैं और गुस्से में हैं। क्योंकि अगर आप इस स्थिति को समझ रहे होते तो उस पर काम कर रहे होते।' पेरिस जलवायु सम्मेलन में कहा गया था कि कार्बन उत्सर्जन को आधा कम कर देंगे। ऐसा करने पर हमारी दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री हो जाएगा, जो 1991 में था। लेकिन हम इसे कम कर ही नहीं पा रहे हैं। सब भाषण दे रहे हैं लेकिन उसको कम कैसे किया जाए इस पर कोई प्लान नहीं बन रहे है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि अगर अब तापमान कम नहीं किया गया तो 2100 में दुनिया भर के बड़े शहर जल मग्न हो जाएंगे। जिसमें सिडनी, मैक्सिको और लॉस एंजिल्स जैसे शहर शामिल हैं। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता के आधे से ज्यादा भाग डूब चुका है। इसी वजह से इंडोनेशिया ने अपनी राजधानी बदलने की घोषणा कर दी है। 

ग्रेटा थनबर्ग

ग्रेटा भावुक होते हुए कहती हैं, आप माने या न माने युवाओं में बदलाव आ रहा है, लोग जाग रहे हैं। वो सभी समझते हैं कि आप लोग कुछ नहीं कर रहे हैं। अगर अब आपने कुछ नहीं किया तो हम लोग आपको कभी माफ नहीं करेंगे। ग्रेटा ने एक साल पहले जो काम खुद किया था उसको करने का हर किसी से कहती हैं। लोगों को अब तख्तियां लेकर सड़कों पर निकल जाना चाहिए। ग्रेटा ने इसके लिए एक मुहिम भी चलाई है, 'फ्राईडे फॉर क्लाइमेट चेंज'। आपको रोज-रोज सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं है, बस हफ्ते के शुक्रवार को सरकार को याद दिलाना है। जब 21 सितंबर 2019 को ये मुहिम शुरू हुई तो ये एक आंदोलन बन गया। हर बड़े शहर में हजारों लोग जुटे। सिडनी और मेलबर्न में तो 80 हजार लोग एक जगह जुटे। दिल्ली, जिसे चलता हुआ शहर कहते हैं। जहां किसी को किसी से लेना-देना नहीं होता है। लेकिन उस दिन हजारों लोग जुटे और सड़क पर निकल पड़े। मैं खुद उस मार्च में शामिल था, उस दिन मुझे लगा कि भीड़ अच्छा काम भी कर सकते हैं। चारों ओर नारे गूंज रहे थे, हमें चाहिए आजादी, सूखे से आजादी, प्रदूषण से आजादी, क्लाइमेट चेंज से आजादी। इस मार्च का सबसे खूबसूरत दृश्य था, दो छोटे-छोटे बच्चे। जो शायद क्लाइमेट चेंज के बारे में सही से समझते भी न हो लेकिन वो इस मुहिम में साथ खड़े थे।

कुछ लोग समझते होंगे कि इससे क्या ही होगा? हो सकता है कि इससे कुछ न हो, हो सकता है यहां आने वाले बहुत से लोग खुद प्रदूषण करते होंगे। लेकिन ये भी सच है कि जब तक लोग जुटते नहीं, सरकार कुछ करती नहीं। जब यहां लोग आएंगे तो कुछ तो पर्यावरण के प्रति, इस समय की स्थिति के बारे में जरूर समझेंगे। तब वो शायद अगली बार ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो पर्यावरण के लिए अच्छा न हो। ग्रेटा की इसी मुहिम की वजह से पूरी दुनिया में पर्यावरण की बहस चल पड़ी है। सब विकास के नाम पर हो रहा है लेकिन ये क्यों नहीं समझते कि ये पर्यावरण भी विकास है। इसे बचाना जरूरी है, बेहद जरूरी।

Thursday, September 5, 2019

जलवायु संकट पर बात क्यों?

पहले गर्मी आई तो हम पूरी दुनिया की आबोहवा की बात करने लगे। हमने देखा कि कैसे उत्तराखंड के जंगल धधक रहे थे। अखबारों में आए दिन कहा जाता रहा कि ये साल का सबसे गर्म दिन रहा। ये भी कहा गया कि इस साल की गर्मी ने 128 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। गर्मी आती है तो हमें एक और समस्या से जूझना पड़ता है पानी की समस्या से। हर बार हम बुंदेलखंड और महाराष्ट्र में सूखे की समस्या को सुनते थे। लेकिन इस बार पानी की समस्या से पूरा देश जूझा। आखिर ये सब क्यों हो रहा है? क्यों चीजें हमारे नियंत्रण से बाहर जा रही हैं? क्यों जलवायु संकट का विषय हमारे अस्तित्व का विषय बन गया है?


जब आइसलैंड का पहला ग्लेशियर ओकोजुकुल खत्म हो जाए तो जलवायु परिवर्तन पर बात होनी चाहिए। जब विश्व को 20 फीसदी ऑक्सीजन देने वाला अमेजन के जंगल में आग धधकने लगे तो जलवायु संकट एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। जब 14 साल की लड़की स्कूल न जाकर क्लाइमेट चेंज पर संसद के सामने धरने पर बैठ जाती है तो ये विषय जरूरी लगता है। जरा सोचिए ऐसा क्यों हो रहा है? इसकी वजह हैं, हम और हमारा विकास।
इस कथाकथित विकास की वजह से ही ये सब हो रहा है। मैं कुछ दिनों पहले ही उत्तराखंड गया था। उत्तराखंड प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ राज्य है। इस राज्य की सबसे बड़ी समस्या है रोजगार। इसी वजह से यहां के लोग उत्तराखंड के लोग पलायन कर रहे हैं और शहरों की ओर लौट रहे हैं। सरकार इसके समाधान के लिए विकास ला रही है और अब उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण का काम जोरों पर है। हरिद्वार से लेकर देवप्रयाग तक सड़क अच्छी की जा रही है और पहाड़ को तोड़ा जा रहा है। जिससे जो पहाड़ पहले खूबसूरत दिखते थे, वो अब बंजर लगते हैं। अगर यही हाल रहा तो पूरा उत्तराखंड बंजर लगने लगेगा। ये तो बस विकास एक पैमाना है। इसके अलावा उद्योग भी एक बड़ा फैक्टर है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है।

पूंजीवाद विकास


भारत कृषि प्रधान देश है, आज भी देश की 60 फीसदी आबादी खेती ही करती है। शहर उद्योगों की तरफ भाग रहे हैं और गाँवों में खेती की जाती है। उद्योगों को चलाने के लिए पहले तो भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है फिर उसका जो वेस्ट मटेरियल होता है वो नदियों में जाकर गिरता है। अभी बरसात है तो दिल्ली में अभी यमुना साफ दिखेगी। कुछ दिन बाद देखना यही पवित्र और स्वच्छ यमुना काली नदी के के रूप में दिखेगी। मुझे अच्छी तरह से याद है इसी साल मई में जब पूरा देश पानी की समस्या से जूझ रहा था, उसमें गुजरात भी शामिल था।
गुजरात में पानी की कमी का हाल कुछ ऐसा था कि गावों में हर रोज पानी का टैंकर सरकार भेज रही थी। कहीं-कहीं तो पानी का टैंकर हफ्ते में एक बार जा रहा था। पानी की संकट की ही वजह से गुजरात मॉडल फेल होता दिखाई दे रहा था। गुजरात में पानी की समस्या इतनी बढ़ गई थी मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने आकर इस पर दखल दिया था। मुख्यमंत्री ने बताया था कि राज्य सरदार सरोवर डैम को छोड़ दिया जाए तो किसी भी बांध में पानी नहीं बचा है। तब उद्योगों को आदेश दिया गया था कि उनको उपयोग किया हुआ पानी दिया जाएगा। शायद यही विकास है जो एक न एक दिन ढ़र्रे पर आ ही जाता है।

जल संकट


हम समझते हैं कि जल संकट का मतलब है पानी की कमी।जल संकट सिर्फ पानी की कमी ही नहीं है, पानी की हद से ज्यादा अधिकता भी जलसंकट है। जलवायु संकट की ही वजह से ये देश सूखा और बाढ़ की ओर एक साथ बढ़ रहा है। जब बारिश नहीं हो रही थी तब देश के आधे राज्य सूखे की समस्या झेल रहे थे। चेन्नई, गुजरात, महाराष्ट्र और हैदराबाद इन सबमें शामिल थे। आपने चेन्नई की वो तस्वीर देखी ही होगी। जिसमें एक तस्वीर पिछले साल की थी, जिसमें पानी ही पानी दिख रहा थी। दूसरी तस्वीर में चेन्नई का पानी गायब हो चुका था। पानी के चारों तरफ बसा ये शहर अब पानी से जूझ रहा है।
जब बारिश हुई तो पूरा देश दो समस्याओं से घिर गया। एक बाढ़ से और दूसरी सूखे से। बिहार के कुछ जगह बाढ़ से परेशान थीं तो दूसरी तरफ उसी बिहार में सूखा भी पड़ रहा था। नर्मदा का स्तर तो इतना बढ़ चुका है कि कई गाँव के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की सूत्रधार मेधा पाटेकर यहां के लोगों के लिए अनशन पर बैठ गईं। ऐसे ही कई राज्य बाढ़ से जूझ रहे हैं। वहीं बारिश के बाद भी पानी की कमी बनी हुई है। सबने बाढ़ पर ध्यान दिया लेकिन उस पानी को संरक्षित करने पर किसी का ध्यान नहीं गया।
प्रधानमंत्री ने भी बस मन की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। सरकार नल से जल की नीति तो ला रही है। लेकिन जब जमीन के नीचे पानी ही नहीं होगा तो सब घर पानी कैसे पहुच पाएगा। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2021 तक देश के 20 बड़े शहरों का ग्राउंड वॉटर खत्म हो जायेगा। हमने पानी संरक्षण किया नहीं इसलिए उसका नतीजा कुछ दिनों बाद मिल ही जाएगा। जब हम पानी की समस्या से फिर से जूझ रहे होंगे। इन सब पर गौर कीजिए और थोड़ा समझिए कि जलवायु परिवर्तन पर बात करना क्यों जरूरी है?

Thursday, March 14, 2019

बिहार राजनीति : जब लालू यादव ने जेपी के पैरों में गिरकर कहा, आप ही हमारे लीडर होंगे

18 अप्रैल 1974

पटना का गांधी मैदान लोगों से खचाखच भरा हुआ है। गांधी मैदान ने ऐसी भीड़ इससे पहले न कभी देखी थी और न ही कभी देखने वाला था। ये जयप्रकाश नारायण का कद था जो इतनी भीड़ को ले आये थे। उसी मंच पर एक व्यक्ति और था जो करतब जुटाकर भीड़ जुटा लेने में माहिर था। वो इस भीड़ को देखकर असमंजस में था क्योंकि उसने न इतनी भीड़ को देखा था और न ही इतने लोगों के सामने बोला था। उस शख़्स का नाम है लालू प्रसाद यादव। उस दिन लालू यादव को भीड़ से प्यार हो गया था। लेकिन ये आंदोलन ऐसे ही नहीं बना था, जयप्रकाश नारायण ऐसे ही नही आये थे। पूरी बात जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं।
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साल 1965

लालू यादव पटना के बिहार नेशनल काॅलेज में पहुंच गये। इस काॅलेज में वे छात्र जाते थे जो पढ़ने-लिखने में कमज़ोर थे। लालू यादव का भी मन पढ़ाई में नहीं लगता था। लालू यादव यहां राजनीति के मोह में नहीं गये थे, वे तो बस कुछ साल काॅलेज में बेपरवाही में गुज़ारना चाहते थे। लालू यादव उस समय काॅलेज में आये जब बी. एन. काॅलेज राजनीति का गढ़ बन चुका था। काॅलेज में एक दल संगठित हो रहा था जो गैर-कांग्रेसी हो। इनका बस एक ही मकसद था, जिस पार्टी का आज़ादी के बाद से पूरे देश पर बोलबाला रहा है, उस कांग्रेस को हराना है।
नीतीश कुमार से हाथ मिलाते हुए लालू प्रसाद यादव
बिहार में पार्टी जातिवाद में बंधी थी। सवर्ण, हरिजन और मुस्लिम कांग्रेस के वोटर थे। जनसंघ, शहर और कस्बों में व्यापारी वर्ग का था। इन सबके अलावा एक वर्ग और उभरकर आ रहा था – समाजवादी धड़ा। लालू यादव भी इस छात्र राजनीति से दूर नहीं रह पाये। लालू यादव समाजवादी धड़े में शामिल हो गये। लालू यादव को समाजवाद की विचाराधारा का ‘स’ भी नहीं पता था। वे तो बस इसलिए जुड़ गये थे क्योंकि ये उनकी जाति की पार्टी थी। लालू यादव को इस राजनीति ने सिर्फ अवसर ही नहीं दिया, पैसा भी दिया।
समाजवादी नेता श्रीकृष्ण सिंह के बेटे नरेन्द्र सिंह उस समय सक्रिय समाजवादी कार्यकर्ता थे। नरेन्द्र को हर कोई जानता था। नरेन्द्र ने लालू यादव को सोशलिस्ट पार्टी की छात्र शाखा में शामिल कर लिया। बाद में यही नरेन्द्र सिंह लालू प्रसाद की कैबिनेट में मंत्री बनने वाले थे और फिर लालू को धोखा देकर नीतीश कुमार का हाथ मिलाने वाले थे। नरेन्द्र को एक पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति की जरूरत थी और लालू यादव में उन्हें वो बात दिख रही थी। जो पिछड़ी जाति के वोट तो खींच ही सकता था और भाषण देने में भी निपुण था।
लालू प्रसाद यादव
कुछ दिनों में लालू यादव समाजवादी पार्टी छात्र नेता के रूप में फेमस हो गये थे। उसके बाद 1967 में छात्र संघ के चुनाव हुए। सबका प्रयास सफल हुआ। ऐसा पहली बार हुआ था कि सत्ता के गलियारे में कांग्रेस की हार हुई हो। विश्वविद्यालय में कांग्रेस यूनियन हार गई और समाजवादी धड़े की जीत हुई। लालू यादव को पटना विश्वविद्यालय का महासचिव बना दिया गया। 1968 और 1969 में वे इसी पद पर रहे। लालू यादव इतने फेमस थे कि 1970 में छात्रसंघ के अध्यक्ष पर उन पर ही दांव चला गया। लेकिन सबकी सोच के विपरीत इस बार लालू यादव कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गये। लालू यादव निराश हो गये और राजनीति छोड़कर नौकरी करने लगे।

साल 1973

पटना विश्वविद्यालय में एक बार फिर से गैर-कांग्रेसी दल इकट्ठा हुआ। सब कांग्रेस को हटाने की वकालत कर रहे थे। उन्हें संगठन के नेतृत्व के लिए एक जोशीला नेता चाहिए था जो पिछड़ी जाति से हो। लालू यादव को वापस बुलाया गया। लालू यादव ने राजनीति के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। इस आंदोलन में लालू यादव के साथ वे नेता शामिल थे जो उनके सबसे बड़े विरोधी होने वाले थे- सुशील मोदी और नीतीश कुमार।
नीतीश कुमार(बायीं ओर), शरद यादव(बीच में), लालू प्रसाद यादव(दायीं ओर)
जल्दी ही पटना विश्वविद्यालय राजनीति में झुलसने लगा। हर रोज प्रदर्शन और विरोध किए जाते। लालू यादव ने छात्रों के लिए मांग की। लालू यादव सबके दिलों में राज करने लगे। लालू यादव को अब छात्र संघ का अध्यक्ष बनना था लेकिन उन्होंने काॅलेज छोड़ दिया। अध्यक्ष बनने के लिए लालू यादव ने लाॅ काॅलेज में एडमिशन ले लिया। लालू चुनाव जीते और छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गये। फरवरी 1974 में लालू यादव ने सभी काॅलेजों को बंद करने की घोषणा कर दी। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष अब्दुल गफूर थे। उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
पूरे राज्य में छात्र आंदोलन ने गति पकड़ ली। विधानसभा का घेराव किया गया, जुलूस निकाले जाने लगे। जिसका नतीजा ये हुआ कि सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी और लाठीचार्ज हुआ। जिसमें दर्जनों छात्र मारे गये और सैकड़ों छात्र गिरफ्तार हो गये लेकिन लालू यादव बच निकले। वे पुलिस को देखकर भाग गये थे। बस यहीं आंदोलन में नया मोड़ आ गया।

जेपी की एंट्री

जयप्रकाश नारायण पटना वापस लौट आये थे। छात्रों ने उनसे आग्रह किया कि आप इस आंदोलन का नेतृत्व करें। जेपी नहीं चाहते थे कि ऐसे आंदोलन में शामिल हों जो हिंसा में लिप्त है। जेपी ने छात्रों के सामने शर्त रखी कि मैं नेतृत्व तभी करूंगा जब तुम लोग अहिंसा की शपथ लोगे। छात्रों ने उनकी बात मान ली। जेपी इसलिए भी खुश नहीं थे कि क्योंकि इस संगठन का नेतृत्व लालू यादव कर रहे थे।
जयप्रकाश नारायण
जेपी, लालू यादव को अविश्वसनीय व्यक्ति समझते थे। लालू यादव, जेपी के पैरों में गिर पड़े और बोले- आपको हमारा नेतृत्व करना पड़ेगा। यह एक आदमी के बारे में सोचने का समय नहीं है, देश के बारे में सोचिए। जेपी मान गये और फिर देश ने पटना के गांधी मैदान में जेपी का जादू देखा।
यह किस्सा संकर्षण ठाकुर द्वारा लिखी गई किताब 'द बिहारी ब्रदर्स' से लिया गया है।

बिहार राजनीतिः जब लालू यादव ने कहा आपको नया नेता चुनना है, चुन लीजिए

एक कमरे में दो शख्स आपस में बात कर रहे हैं। सफेद कपड़ों में बैठा व्यक्ति डरा हुआ लग रहा है। उसे डर था आने वाली सुबह का, वो डरा हुआ था कोर्ट में आये फैसले से। उसने अपने साथ वाले व्यक्ति से पूछा- क्या सीबीआई सच में उसको जेल भेज सकता है? उस व्यक्ति ने हां में जवाब दिया। कितने समय के लिए? अगला सवाल फिर आया। जवाब आया-शायद 6 महीने के लिए। उसके बाद एक उदासी भरा वाक्य कमरे में गूंजा। सही ही है, शायद मुझे जनता की थोड़ी-बहुत सहानुभूति मिल जायेगी।

24 जुलाई, 1997

पटना हाइकोर्ट में वकीलों और मीडिया की अच्छी-खासी भीड़ थी। उस दिन बिहार के मुख्यमंत्री पर फैसला होना था। सबको लग रहा था कि इस बार भी चतुर नेता फिर चूहे-बिल्ली का खेल ही खेलेंगे। लेकिन पटना हाईकोर्ट ने उस अर्जी को खारिज कर दिया। मतलब मुख्यमंत्री को अब जेल जाना था।
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लालू यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
मुख्यमंत्री जो राज्य को अपना शासन समझता था, नेता जो सबका चहेता था,जिसने चतुराई अपने गुरू चन्द्रशेखर से सीखी थी। ये बिहार के चतुर नेता लालू प्रसाद यादव के चारे घोटाले का किस्सा है। जिसमें हार के बाद भी शासन उनका ही बना रहा।
गुजराल उस समय देश के प्रधानमंत्री थे और लालू उनके चहेते माने जाते थे। जब गुजराल लालू प्रसाद को बचाने की कोशिश करने लगे तो उनको आदेश मिला कि ऐसा किया तो सरकार गिर सकती है। सरकारी बंगला, 1 अणे मार्ग जो लोगों के जमावड़े से भरा रहता था। वहां उस दिन उदासी और निराशा पसरी हुई थी। घर पर बार-बार फोन बजता और लालू उसे उठाकर गुस्से में पटक देते। राबड़ी देवी और बेटे अपने कमरे में रो रहे थे। सिर्फ बड़ी बेटी मींसा गांधी अपने पर नियंत्रण रखी थी और चुप थी।
वहीं दूसरी ओर पटना उच्च न्यायालय के बाद से कानूनी प्रक्रिया तेज होने लगी। डेढ़ साल की पूरी मेहनत के बाद लालू प्रसाद यादव के खिलाफ वारंट मिला था। उपेन्द्र नाथ बिस्वास लालू प्रसाद की गिरफ्तारी में देरी नहीं करना चाहते थे। उपेन्द्रनाथ सीबीआई निदेशक और चारा घोटाले के जांचकर्ता थे। उपेन्द्र नाथ को डर था कि लालू की गिरफ्तारी से राज्य में दंगे भड़क सकते हैं, खून खराबा हो सकता है। इसलिए पश्चिम बिहार के उस बंगले को चारों तरफ से रैपिड एक्शन फोर्स ने घेर लिया। जहां बिहार के मुख्यमंत्री और राज्यपाल रहते थे।
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लालू यादव का पूरा परिवार।
लालू यादव के बंगले से थोड़ी दूर पर भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय था। जहां बीजेपी कार्यकर्ता और समर्थक इस फैसले से जश्न मना रहे थे, मिठाई बांट रहे थे। बीजेपी नेताओं को लगने लगा कि लालू यादव का युग समाप्त हो गया है। सुशील मोदी उस फैसले को याद करते हुए बताते हैं
‘‘लालू यादव बहुत चतुर राजनीतिज्ञ है लेकिन उस शाम मुझे लगा था कि सारे रास्ते बंद हो चुके थे।”
लालू प्रसाद यादव अपना आखिरी जोर लगा रहे थे। उन्होंने दिल्ली प्रधानमंत्री गुजराल को फोन लगाया। गुजराल से लालू यादव की बात नहीं हो पाई। लेकिन एक संदेश आया, राज्यपाल ए. आर. किदवई के पास। संदेश में साफ था कि लालू यादव का वारंट आ चुका है। उनका इस्तीफा दिलवाओ या बरखास्त करो।
जांचकर्ता उपेन्द्रनाथ विस्वास के लिए वो शाम बड़ी ही अधीर थी। अगले दिन वे राज्य के सबसे बड़े नेता और मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने वाले थे। उपेन्द्रनाथ मुख्यमंत्री आवास के पास कोल इंडिया गेस्ट हाऊस में रूके हुये थे। उस दिन को याद करते हुए उपेन्द्र बताते हैं ‘‘उस समय मैं बहुत उत्साहित था और बैचेन भी। मैं जानता था लालू यादव चतुर राजनेता हैं। मैं उन सभी खामियों के बारे में सोच रहा था जिनका फायदा उठाकर लालू यादव सीबीआई के शिकंजे से बच सकते हैं।’’
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चारे घोटाले के जांचकर्ता उपेन्द्र नाथ बिस्वास।
रात 10 बजे लालू यादव अपने बंगले पर अपने साथियों के साथ बैठे थे। निराश और उदास होकर सीढ़ियों से अपने कमरे में जाने लगे। जहां उनकी पत्नी राबड़ी देवी रो रहीं थीं। लालू यादव को अब एक कठिन निर्णय लेना था। सीढ़ी चढ़ते हुये लालू प्रसाद ने निर्णय ले लिया था। अपने कमरे में जाकर अपनी पत्नी को आदेश सुना दिया।

कल तुमको सीएम पद की शपथ लेना है, तैयारी शुरू करो।

लालू यादव के संयुक्त मोर्चे ने उनका साथ देने से मना कर दिया था। अब राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना मुश्किल लग रहा था। लालू ने अपना दूसरा दांव चला। दिल्ली में बैठे कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को फोन लगाकर। केसरी उस समय फोन पर नहीं आये। लालू ने अपने विश्वसनीय राधानंद झा को एक संदेश लेकर दिल्ली भेजा। लालू प्रसाद यादव अब समर्पण करने को तैयार थे लेकिन सत्ता छोड़ने को नहीं।
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लालू यादव उस फैसले के कारण परेशान थे।

25 जुलाई 1997

उपेन्द्र नाथ बिस्वास अपनी पूरी तैयारी के साथ लालू यादव को गिरफ्तार करने जा रहे थे। तभी उनके पास एक फोन आता है। उन्हें संदेश मिलता है लालू यादव खुद आत्म समर्पण करने आ रहे हैं। बस उन्होंने इंतजाम करने के लिए थोड़ा समय मांगा है। लालू यादव विधानमंडल जाते हैं और सभी मंत्रियों के सामने इस्तीफे की घोषणा कर देते हैं।

‘‘आप लोगों को नया नेता चुनना है, चुन लीजिए।’’

इतना बोलकर लालू मीटिंग छोड़कर चले जाते हैं। थोड़ी देर बाद राबड़ी देवी पहुंचती हैं। साथ में भाई साधु यादव और अनवर अहमद भी आते हैं। नेता के चुनने की प्रक्रिया शुरू होती है। ऊर्जा मंत्री श्याम रजक एक नाम का प्रस्ताव पेश करते है और पूरे हाॅल में नारा गूंजने लगता है- ‘लालू यादव जिंदाबाद! राबड़ी देवी जिंदाबाद!
बाद में सबने लालू यादव के इस फैसले पर नैतिकता और वंशवाद की स्याही छिड़कनी चाही। लालू बेखटक जवाब देते, कैसा वंशवाद! मैंने अपनी सत्ता बचाई है। अगर राजनैतिक विरोधी को सत्ता न देना अनैतिकता है तो मैं ऐसी नैतिकता करता रहूंगा।
 ये किस्सा संकर्षण ठाकुर की किताब बिहारी बंधु के आधार पर लिखा गया है।

क्या सच में इंदिरा गांधी के फिरोज के अलावा किसी और से प्रेम संबंध थे?

इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री आवास के एक कमरे में बैठी थी। तब इन्दिरा काँग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थी। कमरे में उनके साथ एक और शख्स बैठा हुआ था। तभी उस कमरे में एक और शख्स आता है इन्दिरा के साथ उस शख्स को देखता है और गुस्से में इन्दिरा गांधी से कहता है- “मुझे तुमसे कुछ कहना था लेकिन अब बाद में कहूँगा”। इस वाकये को सुनकर लगता है कि वो गुस्सैल व्यक्ति फिरोज गांधी होंगे लेकिन वो शख्स फिरोज गांधी नहीं कोई और था। जिसने आगे चलकर बताया कि इन्दिरा गांधी और उसके बीच प्रेम संबंध थे। तब की बात में आज किस्सा इन्दिरा गांधी के प्रेम संबंध की।

फिरोज और इन्दिरा गांधी के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई थी कि लगने लगा था कि जल्दी ही दोनों के बीच तलाक हो जाएगा। इसका कारण फिरोज के कई लड़कियों के साथ प्रेम संबंध थे जिसके कारण इन्दिरा और फिरोज के रिश्ते खराब होने लगे थे। जवाहर लाल नेहरू तो पहले से ही फिरोज गांधी को पसंद नहीं करते थे। फिरोज कि मौत के दो साल पहले 1958 में पुपुल जयकर ने इंदिरा को उड़ रही अफवाह के बारे में बताया था कि फिरोज से बदला लेने के लिए वे कई पुरुषों के साथ प्रेम संबंध बना रही हैं। ये सुनकर इंदिरा गांधी ने गुस्से में कहा- ‘इससे पहले कि तुम दिल्ली की गपशप मंडली से इस बारे में जानो, मैं तुम्हें बता दूं कि मैं फिरोज को तलाक दे रही हूँ’। फिरोज गांधी ने भी ऐसा ही कुछ अपने दोस्तों से गुस्से में कहा था। फिरोज ने इंदिरा को इन्दु या मेरी पत्नी कहना बंद कर दिया था। उसकी जगह फिरोज उनको श्रीमती गांधी कहकर पुकारते।
जवाहर लाल नेहरू का पूरा जीवन बेहतर लोगों से दोस्ती बनाने में बीता। जिसका फायदा बाद में इन्दिरा गांधी को भी मिला। डीपी धर और पीएन हक्सर पंडित नेहरू के ही करीबी थे जिन्होने इन्दिरा गांधी का साथ कभी नहीं छोड़ा। ऐसे ही एक शख्स और हैं जिन्होने जवाहर लाल नेहरू को बड़े करीब से देखा, एम ओ मथाई।
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एम ओ मथाई 1946 से 1959 तक जवाहर लाल नेहरू के पर्सनल सेक्रेटरी रहे। एम ओ मथाई छोटे कद के फुर्तीले शख्स जो अपने काम को पूरी लगन से करते। उनकी यही लगन उनको नेहरू परिवार के इतने करीब बनाए हुये थी। उन्हें सभी लोग मैक कहकर पुकारते थे। मथाई नेहरू के बहुत करीब थे, वे उन लोगों में आते थे जिन पर जवाहर लाल नेहरू आँख मूंदकर विश्वास कर लेते थे। उनकी पंडित नेहरू से ये नजदीकी इन्दिरा गांधी को पसंद नहीं थी। इसका तोड़ उन्होने प्रेम निकाला। इन्दिरा गांधी कथित रूप से मथाई कि प्रेमिका थीं। एम ओ मथाई ने एक किताब लिखी ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज’, जिसमें एक चैप्टर है ‘शी’। इसमें मथाई ने इन्दिरा गांधी और अपने प्रेम के बारे में लिखा है। हालांकि ये किताब जब छपी थी तब उसमें ये चैप्टर नहीं था। जिसे बाद में मेनका गांधी ने लोगों के सामने प्रसारित किया था।
इस किताब में लिखा है कि जवाहर लाल नेहरू एडविना माउंटबैटन, पद्मजा नेहरू और मृदुल साराभाई जैसी सुंदरियों के साथ व्यस्त रहते थे। जिसकी वजह से वे अपनी सरकार सही से नहीं चला पा रहे थे। इन्हीं कारणो से हम 1962 कि जंग में चीन से हार गये। अब उस चैप्टर पर आते हैं जिसमें इंदिरा और मथाई के प्रेम के बारे में लिखा गया है। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके और इंदिरा के बीच गहरा प्रेम था और इस प्रेम कि शुरुआत इंदिरा के घर में हुई थी। मथाई बताते हैं कि उनके और इंदिरा के बीच 12 साल तक प्रेम बना रहा। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि उनके प्रेम से इंदिरा एक बार माँ भी बनीं थीं। जिसका इंदिरा ने अबॉरशन करा लिया था।
मथाई लिखते हैं कि इंदिरा ने उनसे एक बार कहा था- मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूँ।’ जिसके जवाब में मथाई ने कहा था कि मुझे अभी इसका अनुभव नहीं है। तब इंदिरा ने उनको दो किताबें दीं जिसमें सेक्स के बारे में में जानकारी दी गई थी। मथाई ने इस चैप्टर में लिखा कि इंदिरा उनके हाथ को सख्ती से पकड़े रहती थीं और प्यार से उनको भूपत कहती। मथाई भी इंदिरा को पुतली कहा करते थे। इसी चैप्टर में मथाई इंदिरा के बारे में लिखते हैं- उसकी क्लियोपैट्रा जैसी नाक है, पाऊलिन बोनापार्ट जैसी आँखें हैं और वीनस जैसे स्तन हैं। उसकी रूखी और घृणास्पद छवि केवल सुरक्षा का कवच था, वे बिस्तर पर बड़ी मजेदार थीं। संभोग के दौरान उसमें फ्रांसीसी औरतों और केरल की महिलाओ का मिश्रण होता, इंदिरा को लंबे-लंबे चुंबन पसंद थे। इस चैप्टर की आखिरी लाइन है- मैं भी उसे प्रेम करने लगा था।
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इस प्रेम संबंध पर इंदिरा ने कभी कोई बात नहीं की। नेहरू के जीवनी लेखक और सर्वपल्ली गोपाल ने उन दोनों के बारे में कहा था- उनको एक-दूसरे को लुभाने में बड़ा मजा आता था। इंदिरा मथाई को कुछ ज्यादा ही बढ़ावा देती थीं। कांग्रेस के नटवर शाह इस बारे में कहते हैं- मथाई ने नेहरू परिवार को बहुत नुकसान पहुंचाया। उन्होने अपने स्वार्थ के कारण इस प्रेम संबंध की अफवाह फैलाई। फिरोज के दोस्त निखिल चक्रवर्ती ने जब मथाई को पैसों के लेनदेन में गड़बड़ी करते पाया तो 1959 में उनको नेहरू परिवार से सेवा त्यागनी पड़ी। इस कहानी की शुरुआत मैंने एक किस्से से की थी। वो किस्सा था मथाई और इंदिरा के प्रेम सम्बन्धों के खत्म होने का। जब मथाई ने इंदिरा को धीरेन्द्र ब्रांहचारी के साथ देखा तो मथाई इंदिरा की जिंदगी से हमेशा के लिए चले गये। ये किस्सा है सच और झूठ के बीच का। सच क्या है वो तो या तो इंदिरा को पता था या मथाई को। मथाई ने अपने हिस्से की बातें बता दी हैं लेकिन इंदिरा की चुप्पी इस वाकये को बंद तिजोरी की तरह छोड़ गई हैं। हमारे पास तो कहानी थी सो बता दी अब सही है या गलत। ये आपके विवेक पर छोड़ते हैं।
इस आर्टिकल के अंश सागरिका घोष की किताब इन्दिरा से भी लिए गए हैं।

शकुंतला देवी किसी गणितज्ञ से ज्यादा मां-बेटी के रिश्ते की कहानी लगती है

तुम्हें क्यों लगता है औरत को किसी आदमी की जरूरत है। एक लड़की जो खेलते-खेलते गणित के मुश्किल सवाल को झटपट हल कर देती है। जो कभी स्कूल नहीं गई ...