Friday, May 15, 2020

मिसेज सीरियल किलरः वही घिसा-पिटा काॅन्सेप्ट जिसे हम कई बार देख चुके हैं

ये कहानी अब खत्म होने वाली है, जैसे हमने सोचा वैसे नहीं।


मनोज वाजपेयी अच्छे एक्टर हैं। माना जाता है कि वो जिस मूवी में होंगे वो अच्छी ही होगी। मगर मिसेज सीरियल किलर मूवी में न तो वो अच्छे दिखे और न ही मूवी। सस्पेंस-थ्रिलर के नाम पर ये वही घिसी-पटी स्टोरी है जो हम कई बार देख चुके हैं। मूवी देखने के बाद आपको अच्छी और बुरी फिल्म में अंतर समझ में आ जाएगा। नेटफ्लिक्स पर 1 मई 2020 को रिलीज हुई इस मूवी में मनोज वाजपेयी, जैक्लीन फर्नांडिस और मोहित रैना मुख्य भूमिका में हैं। डायरेक्शन से लेकर म्यूजिक तक सारे काम शिरीष कुंदर ने खुद किए हैं।

कहानी


एक हिल स्टेशन पर रहने वाले नामी गायनोलाॅजिस्ट डाॅ. मृत्युंजय मुखर्जी अपनी पत्नी सोना के साथ रहते हैं. डाॅक्टर को पुलिस छह लड़कियों की आॅनर किलिंग के मामले में गिरफ्तार कर लेती है। इंस्पेक्टर इमरान शाहिद के सबूतों से सबको लगता है कि मृत्युंजय मुखर्जी ने ही ये काम किया है। डाॅक्टर की पत्नी सोना को अपना पति निर्दोष लगता है। उसे ये इंस्पेक्टर की चाल लगती है जो उसका कभी बाॅयफ्रेंड था। सोना अपने पति को बचाने के लिए कुछ भी कर सकती है और वैसा ही कुछ करती भी। जिससे उसका पति जेल से बाहर आ जाता है। उसके बाद जो मूवी में होता है उसे ही संस्पेंस का नाम दिया गया है। आगे क्या होता है? इसके लिए आपको मूवी देखनी होगी। फिर भी मैं इतना तो बता ही देता हूं कि इतना कुछ संस्पेंस नहीं होता है जो चौंका दे।


मूवी बनाई तो गई मर्डर मिस्ट्री पर लेकिन इसमें कुछ मिस्ट्री कहीं नही दिखाई देता। कहानी जिस तरह से शुरू होती है वो थोड़ा रोमांच पैदा करता है लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है ग्राफ नीचे गिरता चला जाता है। मूवी खत्म होने से बहुत पहले ही समझ आ जाता है कि ये हत्याएं किसने की हैं। मूवी खत्म होने पर आप निराश ही होंगे। डायलाॅग भी कुछ खास नहीं हैं जो दर्शकों पर प्रभाव छोड़ सकें। गाने भी ऐसे जो मूवी खत्म होने के बाद आप भूल जाएंगे। मूवी में अगर कुछ अच्छा है तो पहाड़ और जंगलों के नजारे। इसके अलावा तो सब कुछ समय की बर्बादी लगता है।

किरदार


गायनोलाॅजिस्ट डाॅ. मृत्युंजय मुखर्जी के किरदार में हैं मनोज वाजपेयी। मनोज वाजपेयी जिस एक्टिंग के लिए सराहे जाते हैं वो इसमें नहीं दिखी। न उनका किरदार जमता है और उनकी एक्टिंग। ऐसा लग रहा था कि वे बुरी एक्टिंग की एक्टिंग कर रहे हों। मुझे याद नहीं मैंने कब मनोज वाजपेयी की इतनी खराब एक्टिंग देखी थी। मेरी तरह कई लोगों ने इस मूवी को मनोज वाजपेयी की वजह से देखी होगी। उन सबको ये मूवी और मनोज वाजपेयी निराश करते हैं।


डाॅ. मृत्युंजय मुखर्जी की पत्नी सोना के किरदार में हैं जैक्लीन फर्नांडिस। जैक्लीन इस मूवी में कुछ खास कमाल नहीं कर पाईं। उनकी एक्टिंग इस मूवी में भी खराब ही है। इसके अलावा इंस्पेक्टर इमरान शाहिद का किरदार निभाया है मोहित रैना ने। मोहित रैना की हाल ही में आई बेब सीरीज भौकाल मुझे अच्छी लगी थी। इस मूवी में मोहित रैना ज्यादा अच्छे तो नहीं लेकिन ठीक-ठीक काम किया है। उनकी एक्टिंग इतनी बुरी नहीं लगती जितनी मनोज वाजपेयी और जैक्लीन की लगती है।

वैसे तो ये मूवी अच्छी नहीं है और समय की बर्बादी है। फिर भी अगर आप घर पर बोर हो रहे हैं तो इसमें टाइम खपा सकते हैं। ये मूवी कुछ नहीं तो पौने दो घंटे का टाइमपास तो करा ही देगी। अगर आपके पास करने को बहुत कुछ है तो इसको देखने का सोचिए भी मत। समय बर्बादी के साथ दिमाग भी खराब करती है ये मूवी।

Sunday, May 10, 2020

म्यूजिक टीचर: इस मूवी से प्यार होना तो बनता है

‘जो ख्वाहिशें पूरी ही नहीं की जा सकती, उनका इंतजार करना कितना मुश्किल होता होगा’।

हर किसी की जिंदगी में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो एक टीस बनकर रह जाता है, जिसे वो याद नहीं करना चाहता। ऐसी टीस कुछ ख्वाहिशें, इंतजार के रूप में बनी रहती है। ये इंतजार कितना बुरा और नाखुश करने वाला हो सकता है यही कुछ बताती है ये मूवी। म्यूजिक टीचर, ख्वाहिश और इंतजार के बीच घूमती है। ख्वाहिश पूरी होती या इंतजार, इसके लिए तो आपको ये मूवी देखनी चाहिए।

कहानी


म्यूजिक टीचर, वैसे तो दो लोगों की कहानी है। बेनी माधव सिंह जो एक म्यूजिक टीचर हैं और मुंबई जाकर फिल्मों में गाना चाहते हैं। पिता के गुजरने की वजह से उसे अपने गांव लौटना पड़ता है। यहां रहकर वो आसपास म्यूजिक सिखाता है। म्यूजिक टीचर का किरदार निभाया है मानव कौल ने। दूसरा मुख्य कैरेक्टर है, ज्योत्सना राॅय। ज्योत्सना, बेनी से म्यूजिक सीखती है। सिखाते-सिखाते कब ज्योत्सना जुनैई बन जाती है पता ही नहीं चलता। दोनों के बीच प्यार हो जाता है। प्यार ऐसा कि दिल खुश हो जाता है। सिर्फ बातों और एक्सप्रेशन से ही दोनों का प्रेम चलता है और जिसे देखकर खुशी होती है।


ज्योत्सना एक जगह कहती है ‘सिंगर बहुत सारे हैं दुनिया में, मगर म्युजिक टीचर आप जैसा कोई नहीं है’। बेनी जुनैई को मुंबई भेजना चाहता है और ज्योत्सना अपने म्युजिक टीचर से हर शाम गाना सुनना चाहती है। बेनी उसे मुंबई भेजता और फिर इंतजार करता है उसके आने का। उसके आने में जो वक्त होता है वो वक्त कैसे कटता है ये उसकी ही कहानी है। मूवी में एक जगह डायलाॅग है ‘तुम हर छोटी बात को इतना उलझा क्यों देते हो’? ऐसी ही कुछ उलझनें बनी रहती है कहानी में। मूवी दो फेस में चलती है एक वर्तमान में और एक जिसे बेनी याद करता है। वर्तमान में बेनी बहुत संजीदा और गंभीर रहता है। जो ज्योत्सना के बारे में जिक्र तो नहीं करना चाहता। मगर न चाहते हुए भी उसका जिक्र हो ही जाता है।

बेनी की मां चाहती है कि वो नौकरी करके, शादी कर ले। मगर वो अकेला ही रहना चाहता है या फिर किसी के इंतजार में रहता है। मूवी में एक जगह दिव्या दत्ता, मानव कौल से कहती है, अकेले तो हमेशा से थे, अब खाली हो गई हूं। बेनी माधव भी वैसे ही अकेले और खाली दिखाई पड़ते हैं। बेनी हमेशा ऐसे ही रहेगा या फिर उसका इंतजार खत्म होगा। ये सब जानने के लिए आपको ये मूवी देखनी चाहिए।


लड़का जब लड़की की तारीफ करता है तो वो झिझकता है, शर्माता है, चेहरा लाल हो जाता है। ऐसे प्रेम को दिखाती है म्युजिक टीचर। लड़की जो उसके साथ पहाड़ों में ही रहना चाहती है लेकिन टीचर के कहने पर चली जाती है हमेशा के लिए दूर। प्रेम को कुछ अलग मगर बेहतरीन तरीके से दिखाती है ये मूवी। मूवी के शुरू के कुछ ही मिनटों में इस मूवी से प्यार हो जाता है। पहाड़, नदी, वादियां, झरने, गांव ये सब कुछ मन को भाने लगता है। इसके अलावा मूवी के गाने बहुत बेहतरीन हैं। मूवी के खत्म होने के बाद भी ‘रिमझिम गिरे सावन’ तो आपकी जुबां पर चढ़ा ही रहेगा। मूवी के डायलाॅग भी बहुत अच्छे हैं, कई जगह तो पंचलाइन सुन पर वाह कहने का मन करता है।

किरदार


बेनी माधव का कैरेक्टर प्ले किया है मानव कौल ने। मानव कौल ने इस मूवी में कमाल एक्टिंग की है। अपने एक्सप्रेशन और सधी बात से अपने किरदार को मजबूत किया है। बिल्कुल सधी की हुई एक्टिंग किसे कहते हैं, ये मानव कौल के इस रोल को देखकर समझा जा सकता है। इसके अलावा दूसरे लीड रोल अमृता बागची ने किया। अमृता इस मूवी में ज्योत्सना के किरदार बखूबी किया। वे इसमें बेहद प्यारी और मासूम लगती हैं। उनका किरदार भी मासूमियत दिखाता है। इसके अलावा बेनी की मां के रोल में थी नीना गुप्ता। नीना गुप्ता का किरदार सहज और सुंदर है, जिसे उन्होंने अच्छे से किया है। दिव्या दत्ता, बेनी माधव सिंह की पड़ोसी के किरदार में थीं। दिव्या दत्ता तो हर मूवी की तरह इसमें भी शानदार थी। कुल मिलाकर सबने अच्छा काम किया।


अप्रैल 2019 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई म्युजिक टीचर सार्थक दासगुप्ता ने डायरेक्ट किया है। ऐसी मूवी कम ही बनती हैं आपको इस मूवी को देख लेना चाहिए। ये फिल्म बताती है कि सब जिंदगी परफेक्ट नहीं होती है, कुछ न कुछ दिक्कतें बनी ही रहती हैं। इसके लिए बस हमें वही करना है जो दिव्या दत्ता मानव कौल से करने को कहती हैं।

‘कभी-कभी दिल की भी सुन लेते, हर फासला दिमाग से तय नहीं किया जाता।’

Friday, May 8, 2020

कामायाबः जिन्हें हम भूल जाते हैं उन साइड एक्टर्स की कहानी है ये

'दर्शकों के दिलों में बस हीरो बसते हैं, हमारी कोई पहचान नहीं होती।'


कामयाब मूवी का ये डायलाॅग इस मूवी की कहानी है। फिल्म इंडस्ट्री में फिल्म बनाई जाती है हीरो के लिए लेकिन उसके अलावा भी बहुत सारे किरदार हो जाते हैं। इनको हम अक्सर भूल जाते हैं। साइड एक्टर, सर्पोटिंग एक्टर या आर्टिस्ट, इन्हें यही कहा जाता है। ऐसे ही साइड एक्टरों की कहानी को बताती है ये मूवी। इसमें कुछ साइड एक्टरों ने अपना रोल खुद ही किया है।

कहानी


सुधीर जो कि इस फिल्म का नायक है और इसको निभाया है संजय मिश्रा ने। सुधीर भी एक कैरेक्ट आर्टिस्ट है जो अब बूढ़ा हो चुका है। उसकी एक बेटी है और एक पोती भी। जो उसको बहुत प्यार करतीं हैं हालांकि वो उनके साथ नहीं रहता है। एक डायलाॅग ‘एंजाॅइंग लाइफ और ऑप्शन क्या है’ की वजह से फेमस सुधीर एक स्कैंडल की वजह से कई सालों से फिल्मों में काम नहीं किया है। एक इंटरव्यू के दौरान उसे पता चलता है कि उसने 499 फिल्मों में काम किया है। बस अब वो 500वीं फिल्म के लिए फिर से एक्टिंग करना चाहता है। बस उसी फिल्म के लिए निकल पड़ता है फिर से फिल्मों की गलियों में।


उसे फिल्म लेने के लिए ऑडिशन देने पड़ते हैं और सुधीर को उसकी आदत नहीं है। ऐसी ही कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। संजय को 500वीं फिल्म दिलवाने का काम करता है, दिनेश गुलाटी। गुलाटी का कैरेक्टर प्ले किया है दीपक डोबरियाल ने। उसके बाद क्या होता है, सुधीर अपनी 500वीं मूवी कर पाता है या नहीं, ये सब जानने के लिए आपको ये मूवी देखनी होगी। फिल्म में कई जगह काॅमेडी है जो दर्शकों को बांधे रखती है। बहुत सारे इमोशनल सीन भी हैं लेकिन सबसे ज्यादा इमोशनल करता है एक सीन। जिसमें संजय बार-बार रीटेक करते हैं।

फिल्म में एक सीन है जिसमें संजय को उनकी पड़ोसी कहती है, बड़ा बेकार शहर है रिजेक्शन की आदत डलवा देता है। ये डायलाॅग उन सभी के बारे में बताता है जो फिल्म की दुनिया में जाते हैं। सभी को कहीं न कहीं रिजेक्शन तो देखना ही पड़ता है। साइड एक्टर जब रिजेक्ट होता है तो उसे क्या फील होता है, होता क्या है? ये सब इस मूवी को देखने पर पता चलता है। साइड एक्टर को सुधीर इस मूवी में आलू कहते हैं जो हर जगह चल जाता है। वो कहते हैं, ‘बच्चन हो, खान हो या कपूर, हम हर जगह फिट हो जाते थे’। फिल्म हीरो की वजह से चलती जरूर हो लेकिन उसे पूरा करते हैं ये साइड एक्टर। साइड एक्टर को कोई याद नहीं रखता है और बूढ़े होने पर कब गायब हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। इसके बावजूद ये हमेशा हमेशा आर्टिस्ट रहेंगे। जिनको अपनी एक्टिंग पर काम मिलता है। फिल्म में एक डायलाॅग भी है, चीजें पुरानी हो जाती हैं बेकार नहीं’।

किरदार


सुधीर का किरदार निभाया है संजय मिश्रा ने। उनकी एक्टिंग ही इस मूवी को बेहद अच्छा और संजीदा बनाती है। फिल्म वो क्लाइमैक्स सीन जब वो अपनी सारी एक्टिंग लोगों को दिखा देते हैं। संजय एक ही समय में कितनी ही एक्टिंग और कितने ही एक्सप्रेसन निकाल देते हैं। संजय को सीन में देखना सुकून देता है, लगता है कुछ बहुत अच्छा देख रहे हैं।


संजय मिश्रा के अलावा दीपक डोबरियाल हैं। दीपक इस मूवी में दिनेश गुलाटी बने हैं जो कास्टिंग डायरेक्टर हैं। जिस तरह कास्टिंग डायरेक्टर होते हैं वैसे ही दीपक गुलाटी इसमें दिखाई देते हैं। उनकी एक्टिंग बेहद अच्छी थी, कहीं से भी वो कम नजर नहीं आ रहे थे।

फिल्म कितनी कामयाब रही, कितनी नहीं, सुधीर कामयाब हुए या नहीं ये तो आपको देखने पर ही पता चलेगा। मैं तो बस इतना कहूंगा कि ऐसी फिल्में कम बनती हैं आपको इसे देखना चाहिए। हार्दिक मेहता ने इस मूवी को डायरेक्ट किया है। प्रोड्यूसर हैं गौरी खान, मनीष मुन्द्रा और गौरव वर्मा। मार्च 2020 में ये मूवी रिलीज हुई थी। अभी ये मूवी आपको नेटफ्लिक्स पर मिल जाएगी। जिस तरह इस मूवी में सुधीर एक डायलाॅग की वजह से फेमस हुआ था, वैसा ही फिल्म खत्म होने पर आपके दिमाग में वो चढ़ जाएगा।

‘एंजाॅइंग लाइफ और ऑप्शन क्या है।’

Tuesday, May 5, 2020

शिकाराः कोशिश है लव स्टोरी के जरिए कश्मीर के दर्द को दिखाने की

'हम आएंगे अपने वतन और यहीं पर दिल लगाएंगे, यहीं के पानी में हमारी राख बहाई जाएगी।'


ये डायलाॅग कश्मीर पंडितों के उस दर्द को बयां करने के लिए काफी है लेकिन अगर आप यही सोचकर शिकारा मूवी देखेंगे तो थोड़ा निराश होंगे। शिकारा तो एक कश्मीरी जोड़े कह लव स्टोरी है। जिसमें कश्मीरी पंडित का विस्थापन है, कुछ-कुछ हालात दिखाए गए हैं और कुछ बाद की जिंदगी। ये सब कुछ सिमटा रहता है शांति और शिव की लव स्टोरी में। जो अपने घर जाना चाहते हैं, शिकारा।

कहानी


फिल्म शुरू होती है एक रिफ्यूजी कैंप से, जहां सब सो रहे हैं। उस सन्नाटे में एक ही आवाज आ रही है टाइपराइटार की। कुछ ही मिनटों में कहानी के दोनों किरदारों को दिखा दिया जाता है, शिव और शांति। दोनों बूढ़े हो चुकेे हैं और अमेरिका के राष्टपति से मिलने आगरा जाते हैं। वहीं से कहानी फ्लैश बैक में चली जाती है, कश्मीर। कैसे शिव और शांति मिलते हैं? उनकी शादी और कुछ किरदार जो मूवी में कुछ देर के लिए ही दिखाई देते हैं। कुछ ही मिनटों में ये सब कुछ दिखा देते हैं।


ये कहानी वैसे तो है शिव और शांति के 30 साल लंबे प्रेम की। जिसके एक-दूसरे से तो प्यार है ही, अपने घर से भी प्यार है। ‘आपको जाना होगा यहां से, कश्मीर हमारा है’, सिर ढको फरमान नहीं पढ़ा हमारा’। ऐसे ही कुछ बातों और दृश्य से उस समय के माहौल को दिखाने की कोशिश की गई है। फिर वो रात दिखाई जाती है जब घाटी में आग-आग होती है। कश्मीरी पंडितों को घरों को जलाया जाता है। उसके बाद लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़कर जम्मू जाते हैं। ये सब कुछ बहुत जल्दी में दिखाया जाता है। थोड़ा और विस्तार से उस रात की कहानी को बताया जा सकता है।

लाखों लोग जम्मू के शरणार्थी कैंप में रहने लगते हैं। साल दर साल कैंप अच्छा हो जाता है लेकिन कश्मीर पर कोई बात ही नहीं दिखाई जाती है। न उस समय की राजनीति और आतंकवाद, यहां तक की कैंप को भी बहुत ज्यादा नहीं दिखा पाए।  फिल्म का एक-दो डायलाॅग जरूर इस बात को दिखाने की कोशिश करते हैं। मूवी में एक सीन है जिसमें शिव अपने पुराने दोस्त लतीफ से मिलता है। तब लतीफ कहता है, हम लोग एक-दूसरे को मारते रहेंगे और जिन्होंने हमारे हाथ में बंदूक पकड़ाईं, वे चुनाव जीतते रहेंगे। ये साल 21 साल, 100 साल और हजार साल ऐसे ही चलता रहेगा।


बीच-बीच में कुछ कविताएं इमोशनल और प्लस प्वाइंट के रूप में जरूर आती हैं। वो कविता तो सबको बेहद प्यारी लगेगी जब गाड़ी से शिव और शांति वापस कश्मीर आते हैं और बैकग्राउंड में एक कविता चलती-रहती है। इसके अलावा कश्मीर का लोक संगीत और कल्चर को शादी और गानों में दिखाया गया है। मुझे लगता है ये फिल्म इस लव स्टोरी के लिए याद की जाएगी। जिसमें शिव शांति के एक वायदे को पूरा करने के लिए अपने घर को बेचता है। वो जो उनका घर नहीं कश्मीर है, घर जिसे वो शिकारा कहते हैं। जब वो अपने घर को कई सालों बाद देखने जाते हैं तो वो दृश्य भावुक कर देता है।

किरदार


लीड रोल में शिव का किरदार किया है, आदिल खान ने। आदिल खान ने अच्छी एक्टिंग की है। उनके एक्सप्रेशन प्रभाव डालते है। उनको स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है। उससे ज्यादा अच्छा लगता है सादिया को देखना। सादिया ने इस मूवी में शांति का किरदार निभाया है। इन्होंने एक्टिंग बहुत अच्छी की है। मूवी में दोनों की जोड़ी कमाल लग रही है।


शिकारा को डायरेक्ट किया है, विधु विनोद चोपड़ा ने। आपको इसको अमेजन प्राइम पर देख सकते हैं। मूवी बहुत खराब नहीं है देखी जा सकती है लेकिन कुछ कमियों की आलोचना की जा सकती है। मूवी कुछ-कुछ बिखरी हुई-सी लगती है। ये न तो पूरी तरह से कश्मीर के उस दर्द को को बता पाती है और न पूरी तरह से लव स्टोरी है। इसमें कुछ प्रेम है, कुछ नफरत है और कुछ दर्द है अपने शिकारा तक न पहुंच पाने का। फिल्म के आखिर तक पहुंचने-से पहले एक डायलाॅग है। जो इस फिल्म का पूरा तो नहीं कुछ-कुछ मौजूं है। उस सीन में शांति शिव से कहती है,

‘‘सारी उम्र बीत गई न पता ही नहीं चला।’’

Sunday, May 3, 2020

थप्पड़ मारने से ज्यादा बुरा है उसे गलत न मानना

उसने मुझे मारा पहली बार नहीं मार सकता, एक बार भी नहीं। बस इतनी-सी बात है।


ये डायलाॅग थप्पड़ मूवी की पूरी कहानी बताता है। इस मूवी में पति अपनी पत्नी पर हाथ उठा देता है और उस औरत को कहा जाता है कि जाने दो कोई बड़ी बात नहीं है। गलती उस पुरूष की नहीं है जिसने थप्पड़ मारा। गलती है लड़की की मां की जिसने कहा कि औरतों को बर्दाश्त करना चाहिए। गलती है इस समाज की जिसने बताया कि थप्पड़ मारना मर्द का हक है। थप्पड़ की कहानी इसी हक को झुठलाने का काम करती है।

फिल्म शुरू होती है कुछ किरादारों से जो फिल्म की भूमिका बनाने का काम करते हैं। उसके बाद दिखाई देता है एक परिवार। जिसमें अमू(तापसी पन्नू) अपने पति विक्रम और अपनी सास के साथ रहती है। अमू हाउसवाइफ और उसका पति विक्रम बड़ी-सी कंपनी में काम करता है। जिसे ऑफिस से लंदन भेजा जा रहा है। पति के इस सपने को अमू अपना मानकर बहुत खुश होती है। लंदन जाने की खुशी में पार्टी होती है और उसी पार्टी में विक्रम अमू को थप्पड़ मार देता है। अमू हर रोज की तरह अगले दिन घर के सारे काम करती है। मगर अब उसके चेहरे से हंसी गायब हो गई थी और एक टीस आ गई थी।


विक्रम उस थप्पड़ के लिए न ही माफी मंगाता है और न ही उसे वो अपनी गलती लगती है। वो तब भी अपनी ही परेशानी बताता रहता है। फिल्म में एक जगह विक्रम अमू से कहता है ‘जिस कंपनी के लिए आप सब कुछ दो। जब पता चले कि वहां आपकी वैल्यू ही नहीं है तो वहां कैसा लगता है?’ विक्रम बोल ये अपने लिए रहा था और अमू को वैसा ही इस घर के लिए महसूस हो रहा था। कुछ दिनों तक वही मायूसी से सब कुछ चलता रहता है। फिर एक दिन अचानक अम्मू पति का घर छोड़कर पिता के घर आ जाती है।

आखिर ये हुआ ही क्यों?


फिल्म में एक सीन है जब विक्रम अपने ससुर से बात कर रहा होता है। तब वो कहते हैं ‘सवाल ये नहीं है कि अब क्या, उससे बड़ा सवाल ये हुआ ही क्यों?’ अनुभव सिन्हा की ये फिल्म उन छोटी-छोटी बातों को बताती है जिनको हम सब बहुत सामान्य मानते हैं। वो थप्पड़ सिर्फ एक थप्पड़ नहीं था। उस थप्पड़ से गिरा था उस औरत का सम्मान, उस थप्पड़ ने छीनी थी औरत की खुशी। इस एक थप्पड़ के बहाने अनुभव और भी बहुत सारी कहानियों को साथ-साथ दिखाते हैं। एक औरत जो अमू के घर काम करती है, एक औरत जो उसकी मां है, एक औरत जो उसकी सास हैं। सब कहीं न कहीं किसी न किसी लेवल पर अपनी खुशी को छोड़कर फैमिली की खुशी का ध्यान रखती हैं। कुछ अपने रिश्ते को बचाने के लिए चुप रहती हैं। हम अपने आसपास देखें तो ये सब कुछ हमारे आसपास हो रहा है। मूवी में एक जगह तापसी पन्नू कहती हैं, मुझे खुशी और सम्मान चाहिए। शायद इस समाज ने सोचा ही नहीं कि पत्नी की भी अपनी इच्छाएं और खुशियां हो सकती हैं।


हमारे समाज में जब पत्नी के साथ कुछ गलत होता है तो आसपास की महिलाएं ही उसे कदम बढ़ाने से रोकती हैं। इस मूवी में भी अमू को उसकी मां और सास भी रिश्ता बचाने को कहती हैं। फिल्म में ये बेहद संजीदगी से बताया कि महिलाएं अपने परिवेश और परंपरावादी सीख की वजह से उस रिश्ते को ढोती हैं। फिल्म आगे बढ़ती है तो कुछ कानूनी पेंच आते हैं। तलाक और बच्चे की कस्टडी पर दांव लगता है। अपने को सही साबित करने के लिए एक-दूसरे पर झूठे आरोप लगते हैं। फिर अनुभव सिन्हा की हर फिल्म की तरह ही इसमें भी एक मोनोलाॅग होता है।

तापसी इस मोनोलाॅग में उस थप्पड़ और सबकी चुप्पी पर सवाल उठाती हैं। वो पूछती है कि आखिर क्यों किसी ने विक्रम को नहीं कहा कि उसकी गलती है? ऐसी ही बहुत सारे सवाल उठाती हैं ये फिल्म। फिल्म खत्म होती है एक अच्छे अंत से। बाकी महिलाएं जो चुप थी और सह रही थी वो अपने आपको घुटन से बाहर निकाल फेंकती है। इसके अलावा बाप-बेटी का रिश्ता बेहद अच्छे तरीके से दिखाया है। पिता को बेटी के लिए कैसा होना चाहिए, उसको पैमाना भी बनाती है ये मूवी।

किरदार


तापसी पन्नू ने अपने संजीदगी और गंभीरता से इस कहानी को बेहद सफल बनाया। उनके अलावा मूवी में उनके पति का किरदार निभाया है पैवल गुलाटी ने। पिता बने हैं कुमुद मिश्रा जो जिन्होंने लाजवाब काम किया है। इसके अलावा रत्ना पाठक और तन्वी आजमी भी है। दिया मिर्जा और मानव कौल थोड़ी-थोड़ी देर के लिए स्क्रीन पर नजर आते हैं।



मुझे लगता है कि ये एक बेहद सफल फिल्म है जो खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में चलती रहती है। ये फिल्म बेहद जरूरी है जिसे हर किसी को देखनी चाहिए। ताकि वो समझ सके कि थप्पड़ मारना किसी का हक नहीं बल्कि अपराध है।

Tuesday, April 28, 2020

फोर मोर शाॅट्स प्लीज चार आजाद ख्याल वाली लड़कियों की कहानी, थोड़ा सच, थोड़ा फसाना है

फोर मोर शाॅट्स प्लीज में चार लड़कियों की कहानी है जो अपने लिए इस समाज से, खुद से लड़ती रहती हैं। चारों बहुत अच्छी दोस्त हैं। लड़ाई, रोना-धोना, बंबई की फैशनबेल लाइफ, लव, ब्रेक अप, सेक्स और स्ट्रगल को दिखाने की कोशिश की गई है। लड़कियां इस समाज को कैसे देखती हैं और ये समाज उनके साथ कैसा बर्ताव करता है। ये इन चार लड़कियों के किरदार से दिखाने की कोशिश की गई। फोर मोर शाॅट्स का दूसरा सीजन हाल ही में आया है। पहला सीजन 2019 में आया था। दूसरा सीजन वहीं से शुरू होता है, जहां पहला सीजन खत्म हुआ था। 10 एपिसोड का ये सीजन अमेजन प्राइम पर रिलीज किया गया है और इसके डायरेक्टर हैं अनु मेनन और नुपूर अस्थाना।


मुंबई में रहने वाली चार लड़कियों की ये कहानी है! अंजना, दामिनी, सिद्धि और उमंग। चारों अलग-अलग बैकग्राउंड की हैं। अंजना एक वकील हैं। तलाक हो चुका है और एक बेटी है। अंजना मूव आॅन करने कीे कोशिश करती है लेकिन फिर से शादी और फैमिली के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती। यही मूव आॅन उसके लिए बहुत सारी उलझने खड़ी कर देता है। अंजना का रोल निभाया है कीर्ति कुल्हाड़ी ने। दामिनी एक पत्रकार हैं। जिनको पहले सीजन में उनकी ही कंपनी से निकाल दिया गया था। अब वे किताब लिख रही हैं जिसको कोई छाप नहीं रहा है। किताब की तरह ही उनकी पर्सनल लाइफ में भी दिक्कतें आती ही रहती हैं। दामिनी के कैरेक्टर में हैं शायोनी गुप्ता।

सिद्धि पटेल, जिसकी पहली सीजन में मां विलेन थी तो इस सीजन में दोस्त बन गई हैं। पहले सिद्धि कुछ नहीं करती थी लेकिन अब अपने आपको खोज लिया है। ये रोल किया है मानवी गगरू ने। उमंग जो बाईसेक्सुअल है। पेशे से एक जिम ट्रेनर हैं। जो पहले सीजन में एक्ट्रेस समारा कपूर की पर्सनल ट्रेनर बन जाती है। बाद में दोनों प्यार में पड़ जाते हैं। बाइसेक्सुअल को ये समाज और सोशल मीडिया कैसे देखता है? उनको किन दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है।ये दूसरे सीजन में बताने की कोशिश की गई है। उमंग को रोल किया है गुरबानी ने। इसके अलावा कई और किरदार हैं। जय एक बार चलाता है। आमिर वारसी एक डाॅक्टर है और शशांक एक वकील। ऐेसे ही कुछ नए पुराने किरदार आते जाते रहते हैं। जय एक बाॅर चलाता है, ट्रक बार। जो इन चारों लड़कियों का अड्डा है। जब भी इनकी लाइफ में कुछ अच्छा और बुरा होता है। वे इसी बार में मिलते हैं।



इस सीजन में समस्याएं और बड़ी हो गई हैं, मेलो ड्रामा भी काफी बढ़ गया है। सीरीज में इन लड़कियों के कैरेक्टर्स से बहुत कुछ दिखाने की कोशिश की गई है। महिलाओं की इच्छाएं, उनकी समस्याएं, सैक्स कोई टैबू नहीं है, फेमनिज्म, पत्रकारिता और एलजीबीटीक्यू जैसे मुद्दों को दिखाने कीे कोशिश की गई है। हो सकता है ये देखकर आपको लगे कि वास्तव में ऐसी महिलाएं न हो और न ही उनकी लाइफ ऐसी हो। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। मगर फिर एंटरटेनमेंट के हिसाब से ये वेब सीरीज काफी अच्छी है। पहले सीजन से दूसरा सीजन काफी इंटेंस है। सबकी लाइफ में खुशी कम, बुरी खबर जल्दी आ जाती है। फिर भी ये दोस्ती नहीं तोड़ेंगे वाली यारी इन चारों के बीच बनी रहती है।

कई लोगों को लग सकता है इसमें अश्लीलता और फूहड़पन है। लेकिन आज जरूरत है है इस पर खुल कर बात करने की। सेक्स के बारे में खुल के बात करना तो अच्छी बात है। अगर आप सेक्स के बारे में बात करने से कतराते हैं तो ये वेब सीरीज आपको जरूर देखनी चाहिए। हर एपिसोड के शुरू होने से पहले कुछ वाॅयस ओवर चलता है। जब वो एपिसोड खत्म होता है तो उस वाॅयस ओवर का मतलब समझ में आता है। पहले सीजन की तरह ही इस सीजन में भी बैकग्राउंड म्यूजिक अंग्रेजी गानों का है। जो समझ में आए न आए सुनने में बेहद अच्छा लगता है। कुछ एपिसोड में स्टैंड अप काॅमेडी का तड़का लगता है जो कुछ हद तक गुदगुदाने का काम करती है। जिन्होंने पहला सीजन देखा है उनको ये सीजन भी पसंद आएगा। जिन्होंने अब तक फोर मोर शाॅट्स प्लीज नहीं देखी है वो देखने को मन बना लें, अच्छी लगेगी।


फोर मोर शाॅट्स प्लीज।

इन चारों की लाइफ कितनी ही खराब क्यों न हो? इनके दोस्त हमेशा इनके साथ खड़े रहते हैं। एक-दूसरे को समझाते है, हल बताते हैं और मजाक तो चलता ही रहता है। चाहे फिर ब्रेक अप की बात हो या किसी गिल्ट की। बेस्ट फ्रेंड का ज्ञान और सीख इस वेब सीरीज में खूब दिया जाता है। पहले सीजन की तरह दूसरे सीजन में भी अंत ऐसी जगह पर छोड़ा गया है जिससे लगता है कि अगला सीजन भी आ सकता है। आपको ये वेब सीरीज अच्छा लगे न लगे एंटरटेनर जरूर लगेगा और आपको इस मूवी का ये डायलाॅग तो याद ही रहेगा ‘जय, फोर मोर शाॅट्स प्लीज’।

Sunday, October 6, 2019

आरे काॅलोनीः रात के अंधेेरे में अंधेर नगरी में एक हत्याकांड

हम सभी का मानना है कि प्रकृति के बीच रहने के कई फायदे होते हैं। तन और मन हमेशा तरोताजा रहते हैं, ऐसा मैं नहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं। लेकिन हमारा देश न जाने किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर्यावरण को बचाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुंबई की आरे काॅलोनी में पेड़ काटे जा रहे हैं। कहा जाता है कि एक पेड़, 100 बेटों के बराबर होता है। मतलब बेटे जितना नहीं करते, उससे ज्यादा फायदा इन पेड़ों से होता है। कहा जाता है कि एक पेड़ एक साल में करीब 117 किलोग्राम ऑक्सीजन देता है और करीब 20 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। 4 डिग्री तापमान को नियंत्रण करता है और कई खतरनाक तत्वों को सोखता है। इसके अलावा हमें इन पेड़ों से चारा मिलता है, फल मिलते है और लकड़िया भी मिलती हैं। से सब बताते हैं कि पेड़ हमारे लिए कितने फायदेमंद हैं। ये अच्छे से समझ लेना चाहिए कि अगर हम पेड़ों को काट रहे हैं तो खुद के जीवन को कम कर रहे हैं।


विकास बनाम पर्यावरण


बिना पेड़ों के जीवन संभव नहीं है कि लेकिन अपने ऑफिस मेंं मजे से बैठे सरकार के मंत्रियों को ये बात कभी समझ नहीं आएगी। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर पेड़ों के संरक्षण के लिए नहीं, पेड़ों के कटने के समर्थन में बयान दे रहे हैं। पेड़ों को काटने की वजह है, मुंबई मेट्रो। हर बार यही शहरीकरण और आधुनिकता के लिए हम पेड़ों को काटते जाते हैं। लेकिन मेरे ख्याल से इसे पेड़ काटना नहीं, पेड़ो की हत्या कहा जाना सही होगा। वर्ना रात के पहर में चोरों की तरह क्यों पेड़ काटे गए?  हमेशा जागने वाली मुंबई शायद इस रात सो गई थी। सोचिए क्या हाल होगा? जब सरकार आपके घर को बुल्डोजर से तोड़ रही हो और आप कुछ न कर पा रहे हों, सिवाय बिलखने के। वैसा ही हाल मुंबई के आरे काॅलोनी का था।

अब सबको समझ जाना चाहिए ये नया भारत कहने वाले, पेड़ों के नहीं हैं, पर्यावरण के नहीं है। इन्हें तो बस विकास चाहिए। तभी तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर कहते हैं, जब दिल्ली में मेट्रे स्टेशन बनना था। तब 20-25 पेड़ काटे जाने थे, तब भी विरोध हुआ था। दिल्ली में 271 मेटो स्टेशन बनाए गए हैं और पेड़ों की संख्या भी बढ़ी है।’ मंत्री साहब भूल जाते हैं कि दिल्ली और मुंबई में कितना अंतर है? दिल्ली में पहले से ही बहुत पेड़ हैं और मुंबई की आरे काॅलोनी इकलौता बचा जंगल है। आप कह रहे हैं कि पेड़ काटकर हम पौधे लगायेंगे। पौधे को बड़ा पेड़ बनने में 5 साल तो लग ही जाते हैं। तब तक क्या मुंबई बिना पेड़ों की रहेगी?

सोशल मीडिया पर बोलती प्रबुद्धता


मुंबई में देश के सबसे प्रबुद्ध लोग रहते हैं लेकिन इनकी बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ सोशल मीडिया और सिनेमा पर ही 
दिखाई देती है। वो प्रबुद्ध लोग जब रात को आराम से नींद ले रहे थे, तब आरे काॅलोनी में आरी चलाई जा रही थी। तब कुछ लोग थे जो इस कटाई का विरोध कर रहे थे। शायद इन लोगों को पता नहीं था कि ये सब विकास के लिए हो रहा था। तभी तो 38 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और इलाके में धारा 144 लगा दी गई है। मैंने अब तक कश्मीर में हिंसा पर, 370 का एक भाग हटाने पर, दिल्ली में किसानों की रैली पर, जाट आरक्षण पर धारा 144 लगते देखी थी। मैं पहली बार देख रहा हूं कि पेड़ों को काटने के लिए धारा 144 लग रही है।


मुंबई के गोरेगांव में बसी आरे काॅलोनी इस महानगर की सबसे हरी-भरी जगह है। 16 वर्ग किमी. में स्थित यह एक हरित पट्टी है। जो 1949 में दूध देने वाले पशुओं को रखने के लिए बनाई गई थी। इसके एक छोर पर संजय गांधी नेशनल पार्क है तो दूसरी ओर पवई लेक, तुलसी लेक और विहार लेक जैसी तीन बड़ी झीलें हैं। अगर इन पेड़ों को काटा गया तो जल्दी ही ये तीन बड़ी झीलें भी खत्म हो जाएंगी। जल संकट का एक बड़ी वजह पेड़ों का खत्म होना भी है। पेड़ों को काटकर पौधारोपण करना कोई समाधान नहीं है। अगर आप ऐसा कुछ करना ही चाहते हैं तो पौधों को लगाकर पेड़ बन जाने दीजिए, उसके बाद उन पुराने पेड़ों को काटिए जिनको आप काटना चाहते हैं। तब आपकी बात न्यायसंगत लगेगी।

हाई कोर्ट बड़ा या सुप्रीम कोर्ट?


ये सब हुआ मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले से। जिसमें उन्होंने कहा कि मुंबई महानगरपालिका के वृक्ष प्राधिकरण का मेट्रो-3 के लिए वृक्षों की कटाई का फैसला पूरी तरह से सही है। हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए दायर जोरू बाथेना की याचिका खारिज की दी। मुंबई की मेट्रो के काम के लिए आरे काॅलोनी के 2,464 पेड़ काटे जाने हैं। फैसला आते ही शाम को पेड़ों को काटना शुरू कर दिया गया। मामला फिर भी अभी तक सुलझा नहीं था। मुंबई हाईकोर्ट ने तो फैसला सुना दिया लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है। यही मामला एनजीटी में भी चल रहा है। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से कब से बड़ी हो गई? पुलिस को आम लोगों की बजाय उन पेड़ काटने वालों को गिरफतार करना चाहिए।

मुझे नहीं पता कि इस मेट्रो से किन लोगों को फायदा होने वाला है। देश के सबसे पूंजीपतियों को या देश की जनता को जैसा सरकार हर योजना पर कहती है। लेकिन ऐसे विकास क्या ही फायदा जो हमारे आने वाले भविष्य को खत्म कर रहा है? हमारी मौलिकता को खत्म कर रहा है। नेता भाषणों में तो दुनिया बदलने की बात कहते हैं लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है तो सबसे पीछे अंगड़ाई ले रहे होते हैं। फाॅरेस्ट रिर्सोसेज आंकलन के अनुसार, 1990 और 2015 के बीच दुनिया भर में जंगल 31.6 फीसदी से घटकर 30 फीसदी पर जा पहुंचे हैं। हम दुनिया को बताते हैं कि हम हरे-भरे देश हैं लेकिन अंदर ही अंदर हम इस हरियाली को खत्म करने पर तुले हुए हैं।


पेड़ो को खत्म करके ऊंची-ऊंची इमारत बना सकते हैं, लंबी-लंबी मेट्रो बनाकर खुश हो सकते हैं। लेकिन इस विकास में एक कमी तो है, लोगों की भलाई। पेड़ सिर्फ हरियाली के लिए नहीं होते हैं, उनसे बारिश होती है, ऑक्सजीन आती है और काॅर्बनडाईआक्साइड जाती है। दुनिया भर की सरकारें विकास के नाम पर आरे काॅलोनी की तरह पेड़ों को काट रही हैं। हर साल हम 1 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर वनों को खो देते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर वापस लौटना बहुत मुश्किल हो जाएगा। हमारे इसी रवैये की वजह से पेड़ हमसे दूर हो रहे हैं। अभी भी समय है हमें पर्यावरण के लिए गंभीर हो जाना चाहिए। अन्यथा भविष्य तो दूर की बात है, वर्तमान भी संकट में आ जाएगा।

शकुंतला देवी किसी गणितज्ञ से ज्यादा मां-बेटी के रिश्ते की कहानी लगती है

तुम्हें क्यों लगता है औरत को किसी आदमी की जरूरत है। एक लड़की जो खेलते-खेलते गणित के मुश्किल सवाल को झटपट हल कर देती है। जो कभी स्कूल नहीं गई ...